चर्चा की गोलमेज़ पर अरुण कमल
अब मंज़र ए आम पर
पेशकश :हंस प्रकाशन नई दिल्ली।
यों तो अरुण कमल ने लिखना सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से ही शुरु कर दिया था किन्तु उनकी पहचान मुकम्मल रूप से आठवें दशक के कवि के रूप में बनी; बल्कि यह भी कि समकालीन कविता को दूर तक प्रभावित करने वाले कवियों में उन्हें शुमार किया जाता है। किसी कवि को उसकी कुछ चुनिंदा उद्धरणीय उक्तियों के माध्यम से समझे जाने की जो परिपाटी प्रचलित है, उसका शिकार हमारे समय के बहुतेरे कवि हुए हैं। यह अवश्य है कि ऐसी पंक्तियाँ,सूक्तियाँ आगे चल कर उस कवि की एक सिग्नेचर ट्यून जैसी बन जाती हैं।
अरुण कमल के पहले कविता संग्रह ‘अपनी केवल धार’ की आखिरी कविता के रूप में धार उस प्रगीतात्मक संरचना का ठोस उदाहरण है जिसमें अपार उद्धरणीयता ही नहीं, हमारे समय की अटूट सचाई भी दर्ज है। हो न हो कवि ने अपने सरोकारों को जिन चंद पंक्तियों में रखना चाहा है, वे यही हैं। किन्तु इसके पीछे जो ताकत रची-बसी है वह है इसकी उद्धरणीयता। वे सूक्ष्म चिंतन और उद्धरणीयता दोनों के संजीदा कवि हैं।
जिस अभावग्रस्त क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अरुण कमल करते हैं, पिछले दो दशकों से वह राजनीतिक जटिलताओं और दैवी आपदाओं, बाढ़, सूखा और दैन्य का मारा है। विचारधारा किसी कवि में किस तरह कूट-कूट कर भरी होती है, यह अरुण कमल की कविताएँ बताती हैं। वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक हैं तो गांधी और लोहिया ने भी उन्हें आकर्षित किया। यही कारण है कि सोवियत विघटन के बाद भी उन्हें यही लगता रहा विषमता और अन्याय को समाप्त करने की कुंजी अभी भी मार्क्सवाद में है। उनका कहना है, जब देश में पूँजी का कोई वास्तविक विपक्ष नही बचे, कविता जीवन का अंतिम मोर्चा, अंतिम चौकी है। वे धन की तरफ ले जाने वोली सफलता के हामी नहीं, चेतना के स्तर पर उत्कर्ष और उदात्तता के हिमायती रहे हैं।
1975 में वे इक्कीस साल के युवा थे, संपूर्ण क्रांति को निकट से देखने वाले किन्तु उसके प्रति संशयी भाव भी रखने वाले। बाद में संपूर्ण क्रांति और खिचड़ी विप्लव के भी द्रष्टा रहे। इन परिस्थितियों ने उनके कवि को भीतर से मॉंजा और परिष्कृत किया कि क्रांति की चमकीली छायाएं कवि-विवेक को आच्छादित न कर सकें। वे तुलसी के प्रशंसक हैं तो कबीर के भी, मीरा के भी तो सूर के भी और आधुनिक कवियों में निराला और मुक्तिबोध के तो हैं ही। उनकी आवाज़ में हमारी कवि परंपरा की आवाज़ का सत्व समाया है। अन्याय के प्रति सचेत हर कवि उनके लिए ध्यातव्य है। उनकी कविताओं में उनकी यह निर्भीकता कि श्राद्ध का अन्न जैसी कविता लिख कर वे हमारे खब्बू समाज का एक प्रतिबिम्ब हमारे सामने रखते हैं और ‘प्यास से तड़पते हुए लोगों/ आज मैं दिन में दो बार नहाया’ –लिखकर वे मध्यवर्गीय आदतों में ढले समाज का रेखाचित्र उकेर देते हैं।
चर्चा की गोलमेज़ पर अरुण कमल के बहाने उनकी कविता, आलोचना, गद्य, विचार एवं चिंतन पर जो कुछ बातें यहां कही गयी हैं उनका उद्देश्य यही है कि प्रथुलता और स्फीति से बचते हुए एक छोटी सी पुस्तक में वह सब कुछ आ जाय जिससे अरुण कमल का लेखकीय व्यक्तित्व पहचाना जाता है। उन्होंने कविता को अनावश्यक ब्यौरों और लाउड होने व आलोचना-समीक्षा को वैचारिकता के अतिरेक से सदैव बचाया है । आशा है चर्चा की गोलमेज़ पर अरुण कमल को आलोचना और विवेक की इसी सत्वग्राहिता के आलोक में देखा-परखा जाएगा।
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हार्ड बाउंड संस्करण
सौजन्य : Hans Prakashan, नई दिल्ली।

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