द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली खंड 3 - Dwarika Prasad Maheshwari Rachanawali Vol 3
Description
“रचनावली के इस तीसरे खंड उनके उत्तरवतों बालकाव्य और बाल कथाओं का समायोजन किया गया है जिसमें दस बालगीत संग्रहों की रचनाएं और बाल कथाएं सम्मिलित है। कविताएं सुनिश्चित उद्देश्यों को समर्पित हैं। उन्हें पता है कि बच्चों को क्या संदेश देना है। यथा, ‘सीढी-सीढी चढ़ते हैं।’ इस एक पंक्ति में जीवन का सार है। एक साथ नहीं। मंजिल पाने के लिए कदम दर कदम चलना और आगे बढ़ना होता है। ‘हम है सूरज चांद सितारे।’ लोक भारती प्रकाशन से दशकों पहले यानी 1981 में एक साथ जो दो संग्रह आए थे, उनमें यह पहला संग्रह है।
वे मानते थे कि ऐसा कुछ रचें कि बच्चों को आनंद मिले, उनका मनोरंजन हो, और उन मूल्यों के अंकुर जमें जिनसे उनका व्यक्तित्व संतुलित और उदार बने। वे आशावादी व मानवतावादी बनें व वैज्ञानिक आधुनिक दृष्टि से संपन्न हों। ‘जल्दी सोना जल्दी जगना’- यह एक शाश्वत सीख है। पर आज लोग दिनचर्या की आपा धापी में इस बात का पालन नहीं कर पाते। कवि बच्चों से तो यही कहना चाहता है कि ‘जिसने जल्दी सोना सीखा/जिसने जल्दी जगना सीखा/स्वस्थ सुखी ज्ञानी बनने का उसे मिल गया सहीं तरीका।’
सन 1981 माहेश्वरी जी के लिए बहुत उर्वर कहा जा सकता है। इसी साल उनकी एक और बाल काव्य कृति सामने आई: ‘मेरा वंदन है।’ इस संग्रह की कविताओं में कवि ने अनेक वस्तुओं के माध्यम से उनके स्वयं के गुणों का बखान किया है। जैसे पानी, साबुन, दर्पण, पहिया, पेड़, आदि। ये सब मातृभूमि और कुदरत की देन हैं। संस्कृत में एक श्लोक है, सूक्त है कि कौन लोग है जो उत्तम जन कहे जाते हैं। माहेश्वरी ने इस श्लोक को एक ललित बालगीत में ढाल दिया है। वे उत्तम है। उत्तम जन, सत्संगति, निर्मल चित्त तथा पेड़ों के धीरज पर बहुत अच्छी कविताएं यहां है। ‘बगुलाः कुशल मछुआ-संग्रह में विशेषकर पक्षी जगत को कविताओं में पिरोया गया है।”
About The Author
“इसी तरह ‘नीम और गिलहरी’ (1984) में गिलहरी, चिड़िया, बया, कोयल और मुर्गे आदि पर कविताएं हैं। ‘चांदी की डोरी’ में प्रकृति, देश प्रेम, जीव जगत तथा खेल कूद संबंधी गीतों का संग्रह है। हम अनेक किन्तु एक यह भाव तो माहेश्वरी जी के बालगीतों का केंद्रीयभाव है। ‘ना मौसी ना’ संवाद के गुणों से संपन्न रचनाओं का संग्रह है। साहस, वीरता, देश प्रेम, व व्यक्तित्व विकास उनके बालगीतों व कथाओं में झलकता है।
माहेश्वरी जी की रचनाओं में ऐसी कल्पनाशीलता है जो अन्यत्र विरल दिखती है। अनेक बाल कवि हिंदी समाज में हुए-निरंकार देव सेवक, डॉ. श्रीप्रसाद, राष्ट्रबंधु, हरिकृष्ण देवसरे आदि किन्तु माहेश्वरी जी की रचनाधर्मिता को लाँघ पाना इनके लिए मुश्किल रहा। राष्ट्रकवि सोहन लाल द्विवेदी तक माहेश्वरी जी की रचनाओं से प्रतिकृत रहते थे। ‘चरखे और चूहे’ में एकीकरण और कुदरत के अनेक रंगों और तत्वों की कविताएं है। 1994 में आया बाल कविता संग्रह ‘धरती के सुमन’ उनका अंतिम बालगीत संग्रह है।
उनकी बाल कथाएं अटूट किस्सागोई से भरी है। ‘श्रम के सुमन’ संग्रह में श्रम के प्रति तो सम्मान है ही, कर्तव्यपरायणता, किसी की बुराई न करना तथा हृदय की उदारता का परिचय देने वाली कथाएं भी इसमें शामिल है। मित्रता का आदर्श भी यहां देखने को मिलता है तथा पक्षी का आत्मबल भी और न्याय की जीत होती है यह तो सर्वसिद्ध है। आठ कहानियों का यह संग्रह ऐसी ही छोटी-छोटी मनोरंजक कहानियों का संग्रह है जिसके लिए लेखक ने अनेक पुरा ग्रंथों-पंचतंत्र व हितोपदेश व अन्य कथाकृतियों से प्रेरणा ली है।
इस तरह रचनावली का यह तीसरा खंड भी उनके साहित्यिक अवदान की वैविध्यपूर्ण झाँकी उपस्थित करता है।”






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