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Sambhav hone ki Ajastra Dhaara

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Author Name – Pawan Mathur
डॉ. पवन माथुर की प्रस्तुत पुस्तक ‘सम्भव होने की अजस्र धारा’ उपलब्धि भी है और हिंदी के विमर्शकारों के लिए अनेकविध चुनौती भी है।

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संभव होने की अजस्त्र धारा- Sambhav hone ki Ajastra Dhaara

Description

डॉ. पवन माथुर की प्रस्तुत पुस्तक ‘सम्भव होने की अजस्र धारा’ उपलब्धि भी है और हिंदी के विमर्शकारों के लिए अनेकविध चुनौती भी है। शमशेर, मुक्तिबोध, गिरिजा कुमार माथुर, अज्ञेय पर उनके तीन-चार आलेख ही यह जतलाने के लिए काफी हैं कि आलोचना और सैद्धांतिकी अपनी अब तक की जकड़बंदियों को तोड़ सकती हैं। संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि सहचर विधाओं के साथ विजयदेव नारायण साही, मलयज, अशोक वाजपेयी आदि विख्यात कवि- समालोचकों ने सर्जनात्मकता को जिस तरह उद्घाटित किया है, उसमें विपिन कुमार अग्रवाल ने ज्ञान-विज्ञान के अनेक नये आयाम जोड़े थे। पवन माथुर उन सबके संश्लेषण में दर्शन, मनोविज्ञान, समाज-विज्ञान आदि ही नहीं, सैंकड़ों नई धाराओं में उमड़ते नवीनतम आविष्कारों, अन्वेषणों, अनुसंधानों और विमर्शों को भी अपने विश्लेषण-संश्लेषण में शामिल कर लेते हैं। – गिरधर राठी
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About The Author

पवन माथुर, हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि गिरिजा कुमार माथुर के सुपुत्र हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में एम.एससी तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस महाविद्यालय में प्राध्यापन प्रारंभ किया। तदन्तर प्रसिद्ध प्रिंसटन विश्वविद्यालय, प्रिंसटन, संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘पोस्ट-डाक्टोरल फैलोशिप’ के अंर्तगत कुछ वर्षों तक शोध-कार्य में व्यस्त रहे। भारत लौटने पर आई.आई.टी. कानपुर में अस्सिटेंट-प्रोफेसर पद पर अध्यापन किया और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग में रीडर के पद पर चयन होने पर अपने पुराने सहकर्मियों में लौट आये। इसी विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के पद से सेवा-निवृत्त हुए। रसायन शास्त्र विभाग में अध्यापन के दौरान बीस से अधिक शोध छात्रों ने उनके दिशा-निर्देश में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। उन्हें यू.जी.सी., सी.एस.आइ.आर., डी.आर.डी.ओ. एवं डी.एस.टी से कई रिसर्च प्रोजेक्ट मिले। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कालेजों एवं हॉस्टलों की गवर्निंग-बाडी में मनोनीत सदस्य रहे। आपने अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी करी।पवन माधुर को कविता और साहित्य की संवेदना विरासत में मिली है। पिता गिरिजाकुमार माथुर और माँ शकुन्त माथुर से बचपन में मिले काव्य-संस्कार का प्रतिफलन ‘मुटिठयों में बंद आकार’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1971), ‘समीकरण’ (सहयोगी कहानी संग्रह 1972), ‘विचार कविता’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1973), ‘एक शब्द है मेरे पास’ (कविता संग्रह, 2001), ‘शब्द-बीज’ (कविता, कहानी, आलोचना का सम्मिलित संग्रह, 2007), ‘शब्द-बीज’ पर आपको हिंदी अकादेमी, दिल्ली का साहित्यिक कृति सम्मान प्राप्त हुआ। साहित्य अकादेमी के लिए ‘गिरिजा कुमार माथुर रचना संचयन’ का चयन एवं संपादन (2019) तथा ‘गिरिजा कुमार माथुर’ के काव्य पर दो पुस्तकों का संपादन, ‘सुधियां उस चंदन वन की’ तथा ‘काल पर छूटी निशानी’ (2020). पवन माथुर ने रसायन शास्त्र से हट कर विज्ञान के अन्य क्षेत्रों – जैविकी, भाषा-विज्ञान और साहित्य के साथ संबंध पर सार-गर्भित लेख लिखे और व्याख्यान भी दिये।

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