संभव होने की अजस्त्र धारा- Sambhav hone ki Ajastra Dhaara
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About The Author
पवन माथुर, हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि गिरिजा कुमार माथुर के सुपुत्र हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में एम.एससी तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस महाविद्यालय में प्राध्यापन प्रारंभ किया। तदन्तर प्रसिद्ध प्रिंसटन विश्वविद्यालय, प्रिंसटन, संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘पोस्ट-डाक्टोरल फैलोशिप’ के अंर्तगत कुछ वर्षों तक शोध-कार्य में व्यस्त रहे। भारत लौटने पर आई.आई.टी. कानपुर में अस्सिटेंट-प्रोफेसर पद पर अध्यापन किया और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग में रीडर के पद पर चयन होने पर अपने पुराने सहकर्मियों में लौट आये। इसी विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के पद से सेवा-निवृत्त हुए। रसायन शास्त्र विभाग में अध्यापन के दौरान बीस से अधिक शोध छात्रों ने उनके दिशा-निर्देश में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। उन्हें यू.जी.सी., सी.एस.आइ.आर., डी.आर.डी.ओ. एवं डी.एस.टी से कई रिसर्च प्रोजेक्ट मिले। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कालेजों एवं हॉस्टलों की गवर्निंग-बाडी में मनोनीत सदस्य रहे। आपने अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी करी।पवन माधुर को कविता और साहित्य की संवेदना विरासत में मिली है। पिता गिरिजाकुमार माथुर और माँ शकुन्त माथुर से बचपन में मिले काव्य-संस्कार का प्रतिफलन ‘मुटिठयों में बंद आकार’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1971), ‘समीकरण’ (सहयोगी कहानी संग्रह 1972), ‘विचार कविता’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1973), ‘एक शब्द है मेरे पास’ (कविता संग्रह, 2001), ‘शब्द-बीज’ (कविता, कहानी, आलोचना का सम्मिलित संग्रह, 2007), ‘शब्द-बीज’ पर आपको हिंदी अकादेमी, दिल्ली का साहित्यिक कृति सम्मान प्राप्त हुआ। साहित्य अकादेमी के लिए ‘गिरिजा कुमार माथुर रचना संचयन’ का चयन एवं संपादन (2019) तथा ‘गिरिजा कुमार माथुर’ के काव्य पर दो पुस्तकों का संपादन, ‘सुधियां उस चंदन वन की’ तथा ‘काल पर छूटी निशानी’ (2020). पवन माथुर ने रसायन शास्त्र से हट कर विज्ञान के अन्य क्षेत्रों – जैविकी, भाषा-विज्ञान और साहित्य के साथ संबंध पर सार-गर्भित लेख लिखे और व्याख्यान भी दिये।






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