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Paschatya Katha – Kahan Chintan Aur Kahani

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Author Name – Pawan Mathur

पवन माथुर एक सुसंस्कृत, प्रसिद्ध साहित्यिक परिवार के हैं। रसायन शास्त्र विज्ञान के क्षेत्र के अध्यवसायी विद्वान हैं और प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी कहानियों का वैज्ञानिक विवेचन किया है।

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‘पाश्चात्य कथा कहन चिंतन और हिंदी कहानी - Paschatya Katha – Kahan Chintan Aur Kahani

Description

पवन माथुर एक सुसंस्कृत, प्रसिद्ध साहित्यिक परिवार के हैं। रसायन शास्त्र विज्ञान के क्षेत्र के अध्यवसायी विद्वान हैं और प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी कहानियों का वैज्ञानिक विवेचन किया है। खूब परिश्रम से ‘कहन’ की विचार सरणियों का सर्जनात्मक आलोचना दृष्टि से उपयोग किया है। फलतः यह किताब ‘पाश्चात्य कथा कहन चिंतन और हिंदी कहानी’ अपूर्व पुस्तक बन गई है। पश्चिम के विचारों को आत्मसात् करके कुछ आधुनिक एवं क्लासिकी हिंदी कहानियों का ऐसा आत्मीय देसी विवेचन अन्यत्र दुर्लभ है, ऐसा मुझे पहली बार लग रहा है। ‘कहन’ रूप-परक लगता है – पवन माथुर ने इस ‘कहन’ का ऐसा संरचनात्मक विवेचन किया है कि रचना का घरबार पाठक देख लेता है, जान लेता है। रूप विवेचन के पीछे भाव-स्थितियों की सघन व्याप्ति है, उसे पाठक महसूस करता है और रचना की दुनिया में स्वयं शामिल हो जाता है। यह रचनात्मक आलोचना की किताब है। पवन माथुर ने यह किताब लिखकर हमें कुछ अच्छा नया पढ़ने को दिया है और अपनी पारिवारिक परंपरा की स्मृति को पुस्तक में रचा-बसा दिया है।

– प्रो. विश्वनाथ त्रिपाठी

About The Author

पवन माथुर, हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि गिरिजा कुमार माथुर के सुपुत्र हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में एम.एससी तथा पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस महाविद्यालय में प्राध्यापन प्रारंभ किया। तदन्तर प्रसिद्ध प्रिंसटन विश्वविद्यालय, प्रिंसटन, संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘पोस्ट-डाक्टोरल फैलोशिप’ के अंर्तगत कुछ वर्षों तक शोध-कार्य में व्यस्त रहे। भारत लौटने पर आई.आई.टी. कानपुर में अस्सिटेंट-प्रोफेसर पद पर अध्यापन किया और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र विभाग में रीडर के पद पर चयन होने पर अपने पुराने सहकर्मियों में लौट आये। इसी विश्वविद्यालय से प्रोफेसर के पद से सेवा-निवृत्त हुए। रसायन शास्त्र विभाग में अध्यापन के दौरान बीस से अधिक शोध छात्रों ने उनके दिशा-निर्देश में पीएच.डी की उपाधि प्राप्त की। उन्हें यू.जी.सी., सी.एस.आइ.आर., डी.आर.डी.ओ. एवं डी.एस.टी से कई रिसर्च प्रोजेक्ट मिले। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कालेजों एवं हॉस्टलों की गवर्निंग-बाडी में मनोनीत सदस्य रहे। आपने अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भागीदारी करी।पवन माधुर को कविता और साहित्य की संवेदना विरासत में मिली है। पिता गिरिजाकुमार माथुर और माँ शकुन्त माथुर से बचपन में मिले काव्य-संस्कार का प्रतिफलन ‘मुटिठयों में बंद आकार’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1971), ‘समीकरण’ (सहयोगी कहानी संग्रह 1972), ‘विचार कविता’ (सहयोगी काव्य संकलन, 1973), ‘एक शब्द है मेरे पास’ (कविता संग्रह, 2001), ‘शब्द-बीज’ (कविता, कहानी, आलोचना का सम्मिलित संग्रह, 2007), ‘शब्द-बीज’ पर आपको हिंदी अकादेमी, दिल्ली का साहित्यिक कृति सम्मान प्राप्त हुआ। साहित्य अकादेमी के लिए ‘गिरिजा कुमार माथुर रचना संचयन’ का चयन एवं संपादन (2019) तथा ‘गिरिजा कुमार माथुर’ के काव्य पर दो पुस्तकों का संपादन, ‘सुधियां उस चंदन वन की’ तथा ‘काल पर छूटी निशानी’ (2020). पवन माथुर ने रसायन शास्त्र से हट कर विज्ञान के अन्य क्षेत्रों – जैविकी, भाषा-विज्ञान और साहित्य के साथ संबंध पर सार-गर्भित लेख लिखे और व्याख्यान भी दिये।

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