द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली 4 - Dwarika Prasad Maheshwari Rachanawali 4
Description
“द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली का चौथा खंड उनकी आत्मकथा एवं उनके नव साक्षरोपयोगी काव्य को समर्पित है। प्रभूत संख्या में कविताएं व गीत, प्रबंध काव्य और मुक्तकों का सृजन करने के बावजूद वे मुख्यतः बच्चों के रचनाकार के रूप में ही जाने-पहचाने जाते हैं। उनके सान्निध्य में रहने का यह सुफल रहा कि एक ऐसे रचनाकार को बहुत निकट से देख सका जो कि पूर्णतया अपने शिक्षण कर्म और रचना कर्म को समर्पित है। आजादी के बाद जब हिंदी प्रदेशों में पाठ्यक्रम बनाए जा रहे थे हमारे पास कोई बना बनाया मॉडल न था। प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए उन्हें यह अनुमान हो चला था कि पाठ्यक्रमों के निर्माण के लिए जिस तरह के प्रतिभावान शिक्षाविद चाहिए वे मुश्किल से उपलब्ध है। उन्होंने बच्चों के लिए पाठ्य सामग्री तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई।
आत्मकथा व नव साक्षरोपयोगी साहित्य का यह खंड इस दृष्टि से अनूठा है कि उन पर मेरी समीक्षात्मक कृति के साथ उनकी रचनावली भी किसी बाल साहित्यकार की पहली रचनावली है। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने छिटपुट बालगीत लेखन के साथ-साथ आत्मकथा लिखना जारी रखा जो उनके जीवित रहते पूरी तो हो गयी थी लेकिन अंत तक अप्रकाशित ही रही जिसे उनके पुत्र ने संपादित कर प्रकाशित कराया। इस आत्मकथा से यह पता चलता है कि एक शैक्षिक अधिकारी और प्रशासक को कैसा होना चाहिए। जीवन संघर्षो में भी मुस्करा कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति ने उनसे बाल साहित्य का सृजन कराया। उत्तर जीवन में प्रौढ़ शिक्षा की उच्च संस्था साक्षरता निकेतन, लखनऊ से जुड़ कर उन्होंने नव साक्षरोपयोगी अनेक कृतियों का सृजन किया जो बच्चों के लिए भी उतने ही ध्यातव्य और रोचक हैं। इन्हें भी रचनावली के इस खंड में सहेजा गया है।”
About The Author
“बाल साहित्य, शैक्षणिक साहित्य व नव साक्षरोपयोगी साहित्य लिखने में माहेश्वरी जी को महारत थी। रचनावली का यह खंड माहेश्वरी जी के गद्य लेखन और नवसाक्षरोपयोगी साहित्य को लेकर उनकी गंभीरता का पता चलता है।
कहना न होगा कि आजादी मिलने के साथ ही गांधी की नीतियों के अनुरूप बुनियादी शिक्षा को महत्व मिलना शुरु हो गया था तथा प्रौढ़ शिक्षा की परियोजनाएं आकार लेने लगी थीं। जिन्हें औपचारिक शिक्षा नही मिल सकी वे अनौपचारिक शिक्षण और स्वाध्याय व पठन-पाठन से नेक इंसान बन सकें और अपनी नागरिकता का सच्चा निर्वाह कर सकें, यह ध्येय प्रौढ़ शिक्षा और साक्षरता रहा है।
भारत को शिक्षित व साक्षर बनाने में साक्षरता निकेतन जैसी संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है।
माहेश्वरी जी ने साक्षरता निकेतन में रह कर अनेक बेहतरीन योजनाओं को मूर्त रूप दिया है। यहां सम्मिलित नवसाक्षरोपयोगी काव्य आज भी हिंदुस्तान की जनता को साक्षर बनाने के लिए प्रासंगिक और उपयोगी है। सर्वशिक्षा अभियान इत्यादि में इस काव्य की अपनी अहमियत है।
आशा है आत्मकथा व साक्षरता कथाओं के इस खंड से इस बाल साहित्यकार के अवदान को पूर्णतः समझने में मदद मिलेगी। साथ ही उनके व्यक्तित्व की समग्र खूबियों का अवलोकन-आकलन हो सकेगा। बच्चों के होने के साथ एक शिक्षाविद के रूप में देश उनके अवदान को कभी भुला न सकेगा।”






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