असमिया समाज और साहित्य में राम - Asameeya samaaj aur saahity mein raam
Description
प्रेमचंद की मान्यता है कि साहित्य का चाहे जो भी रूप या विधा हो, उसका उद्देश्य हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या होना चाहिए। साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब होता है। जो भाव और विचार लोगों की हृदय को स्पंदि करने हैं। पुनः प्रेमचंद जी कहते हैं कि हमारे लिए कविता के वे भाव निरर्थक हैं, जिनसे संसार के नश्वरता का आधिपत्य हमारे हृदय पर और दृढ़ हो जाय, जिनसे हमारे हृदयों में नैराश्य छा जाय। वे प्रेम कहानियों, जिनसे हमारे मासिक पत्रों के पृष्ठ भरे रहते हैं, हमारे लिए अर्थहीन है, अगर वे हम में हरकत और गर्मी नहीं पैदा
करतीं। हमें उसे कल की आवश्यकता है जिसमें कर्म का संदेश हो
About The Author
डॉ. जोनाली बरुवा
जन्म: १८ अगस्त
स्थान: कामपुर, नगाँव (असम)
माता दीनमाई गगै बरुआ (सेवा निवृत्त शिक्षिका)
पिता: डॉ. प्रसन्न बरुआ
शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी व असमीया) स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद), पी. एचडी.
सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मरिधल महाविद्यालय, धेमाजी (असम)
रुचि : लोकसाहित्य, तुलनात्मक अध्ययन
प्रकाशित रचनाएँ/कृति सेतु (अनुवाद, कहानी संकलन), कोलाहल (कविता).
साहित्य एवं लोक साहित्य (निबंध संग्रह) अरण्य रोदन (कविता संग्रह) व्यक्ति, समाज एवं साहित्य, असमीया लोक समाज में डाक प्रवचन।
काव्य संरचना, आत्म सृजन, अभिजना, शब्द सृजन, चिरंतन, काव्य धारा, काव्य चिंतन, सृजन प्रवाह, भावों के मोती, सृजन संगम, अंतर्मन के भाव, भावों की रश्मियाँ (काव्य संकलन) प्रकाशित एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित।
सम्पादनः अन्वेषा, कपिली नन्दिनी, डरियली, प्रज्ञा, प्रतिबिम्बन (पत्रिका) आदि, और ५ पुस्तकें ।
सम्मान : काव्य संरचना, साहित्यश्री, शब्द साधक, काव्य चिंतन साहित्य सम्मान, राष्ट्र गौरव, भावोन्नति साहित्य सम्मान, वाग्देवी सम्मान एवं आत्म सृजन साहित्य सम्मान आदि (श्री नर्मदा प्रकाशन, लखनऊ द्वारा)






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