हिंदी साहित्य का इतिहास - Aachaary Ramchandra Shukl
Description
पल-पल परिवर्तनशील संसार में इतिहास-निर्माण का कार्य निरन्तर चलता रहता है। यह कार्य प्रकृति स्वतः करती है, मनुष्य तो उसे शब्द मात्र देता है। जो आज घटित हो रहा है, वह कल इतिहास बन जायेगा, और अधिक कहें तो कल ही क्यों, वर्तमान में घटित घटना अगले ही क्षण इतिहास बन जाती है। इतिहास का शाब्दिक अर्थ है।
इति+ (ऐसा)+ह (निश्चयपूर्वक) आस (हुआ) अर्थात् ऐसा निश्चयपूर्वक हुआ। निश्चयपूर्वक हो चुकी अतीत की अवस्थाओं का अवलोकन ही इतिहास का कार्य है।
प्रत्येक वस्तु का इतिहास होता है। हिंदी साहित्य का भी अपना इतिह्यस है। कोई भी इतिहास अचानक से अपने विकास की चरम स्थिति में नहीं पहुँच पाता, इसके लिए विभिन्न इतिहासकारों को सामग्री संकलन, वर्गीकरण, विश्लेषण, संश्लेषण आदि प्रक्रियाओं का मार्ग तय करना पड़ता है। इस इतिहास लेखन के कार्य में व्यक्ति-विभिन्नता के कारण मत-भिन्नता और विविधता का आना स्वाभाविक है। क्योंकि सौन्दर्य वस्तु में नहीं, देखने वाले के नेत्रों में होता है। इसी कारण हिन्दी साहित्य की इतिहास संबंधी अवधारणाओं में भी मतैक्य नहीं है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का प्रथम प्रयत्न फ्रेंच विद्वान गार्सा तासी की लेखनी में किया, जब 1839 में फ्रेंच भाषा में इस्त्वार-द-ला-लिटरेराल्यूर-एन्दुई में ऐन्दुस्तानी के नाम से हिन्दी कवियों का इतिहास प्रकाशित हुआ। 1873 में पं. महेशदत्त शुक्ल को ‘भाषा काव्य संग्रह’ से साहित्य जगत का परिचय हुआ जिसमें कुछ कवियों का रचनाओं के साथ उल्लेख ‘शिवसिंह सरोज’ में किया। सन् 1839 में जार्ज ग्रियर्सन ने ‘मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ नार्दर्न हिन्दुस्तान’ व 1913 में मिश्र बन्धुओं ने ‘मिश्रबन्धु विनोद’ लिखकर हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन को एक नई दिशा दी। इन्होंने परम्परा से हटकर हिंदी साहित्य के इतिहास में वर्गीकरण की ओर ध्यान दिया।
सन् 1929 में पं. रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिखकर हिंदी-साहित्य के इतिहास लेखन की दिशा में एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया। इस ग्रन्थ में शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य की पद्धतिगत विशेषताओं का विश्लेषण किया। आचार्य शुक्ल का यह ग्रंथ पहले नागरी प्रचारिणी सभा में
About The Author
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (1 अक्टूबर 18842 फरवरी 1941) हिन्दी आलोचक, कहानीकार, निवन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुषादक, कथाकार और कवि थे। उनके द्वारा लिखी गई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है हिन्दी साहित्य का इतिहास, जिसके द्वारा आज
भी काल निर्धारण एवं पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता ली जाती है। हिन्दी में पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ। हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में भी शुक्ल का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भाव, मनोविकार सम्बन्धित मनोविश्लेषणात्मक निवन्ध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। शुक्ल ने साहित्य के इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनव्र्याख्या की।
अध्ययन के प्रति लग्नशीलता शुक्ल में वाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका। मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में स्कूल फाइनल परीक्षा (६।) उत्तीर्ण की। उनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, किंतु शुक्ल उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पित्ता जी ने उन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत में न होकर साहित्य में थी। अतः परिणाम यह हुआ कि वे उसमें अनुत्तीर्ण रहे। शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदार की जगह दिलाने का प्रयास किया, किंतु उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह संभव न हो सका।
1903 से 1908 तक आनन्द कादम्बिनी के सहायक संपादक का कार्य किया। 1904 से 1908 तक लंदन मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक रहे। इसी समय से उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और धीरे-धीरे उनकी विद्वता का यश चारों ओर फैल गया। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें हिन्दी शब्दसागर के सहायक संपादक का कार्य-भार सौंपा जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया। श्यामसुन्दर दास के शब्दों में शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के याध्यापक नियुक्त हुए जहाँ श्यामसुंदर दास की मृत्यु के बाद 1937 से जीवन के अंतिम काल 941 तक विभागाध्यक्ष के पद पर रहे।






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