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सर्जक का स्वप्न

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Author Name – Jitendr Shreevaastav
सर्जक का स्वप्न’ सुख्यात कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नयी पुस्तक है। इसमें उनके कई चर्चित आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। पुस्तक की विविधता और सम्पन्नता देखते ही बनती है। संभवतः जितेन्द्र पहले ही आलोचक हैं जिन्होंने केदारनाथ अग्रवाल के लगभग समूचे गद्य पर डूबकर पूरे विस्तार से लिखा है।

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सर्जक का स्वप्न- Sarjak ka svapn

Description

सर्जक का स्वप्न’ सुख्यात कवि-आलोचक जितेन्द्र श्रीवास्तव की नयी पुस्तक है। इसमें उनके कई चर्चित आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। पुस्तक की विविधता और सम्पन्नता देखते ही बनती है। संभवतः जितेन्द्र पहले ही आलोचक हैं जिन्होंने केदारनाथ अग्रवाल के लगभग समूचे गद्य पर डूबकर पूरे विस्तार से लिखा है। गोदान, रंगभूमि, सुनीता और ध्रुवस्वामिनी जैसी कालजयी कृतियों पर केन्द्रित निबंध इस पुस्तक की गुणवत्ता और प्रासंगिकता में वृद्धि करते हैं। नागार्जुन के उपन्यासों पर स्त्री मुक्ति के संदर्भ में किया गया विचार भी निश्चय ही इस पुस्तक को उल्लेखनीय बनाता है।

जितेन्द्र श्रीवास्तव उन आलोचकों में हैं जो हिन्दी के साथ-साथ उर्दू साहित्य पर भी दृष्टि रखते हैं। पूर्व में प्रकाशित अपनी पुस्तकों में वे वली दक़नी, मिर्ज़ा ग़ालिब, कैफी आजमी और इस्मत चुगतई पर विस्तार से लिख चुके हैं। इस पुस्तक में उन्होंने महान कथाकार मंटो की प्रासंगिकता पर विचार किया है। भारत जैसे देश में दो भाषाओं के बीच की यह आवाजाही बेहद अर्थपूर्ण है। इसके निश्चित सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थ हैं।

About The Author

पाठक देखेंगे कि ‘यात्रा वृतांतों में भारतीय संस्कृति’ जैसे अनूठे निबन्ध में भी जितेन्द्र संस्कृति के प्रश्न पर किसी लेखक को कोई छूट या वरीयता नहीं देते हैं। आलोचकीय ईमानदारी, सहजता, प्रतिबद्धता, पारदर्शिता और भाषिक स्पष्टता जितेन्द्र श्रीवास्तव की आलोचना की पहचान है। वे लेखन में किसी भी प्रकार के समझौते और अनावश्यक शोर के विरोधी हैं। अकारण नहीं है कि इस पुस्तक में ऐसे रचनाकारों-चिंतकों के रचनाकर्म पर भी पूरी गम्भीरता से विचार किया गया है, जिनका लेखन तो रेखांकन के योग्य है लेकिन जिन्हें कभी मुख्य धारा का लेखक नहीं माना गया।

जितेन्द्र अपने लेखन से इस प्रवृत्ति का प्रतिवाद करते हैं। वे मुख्य धारा के आतंक को किनारे करते हुए अच्छी रचनाओं तक पहुँचने की निरंतर कोशिश करते हैं और समर्थ रचनाशीलता के प्रति अपना आदर व्यक्त करते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि उनकी यह नई पुस्तक अपनी पूरी विनम्रता के साथ हिन्दी आलोचना के परिसर का सार्थक विस्तार करती है।

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