नाटकीय शब्द और रंगमंच - Naatakeey shabd aur rangamanch
Description
नाटक और रंगमंच एक दूसरे के साथ इतने संश्लिष्ट और गहरे रूप में सम्बद्ध हैं कि उन्हें अलग-अलग रखकर देखा-पहचाना नहीं जा सकता। नाटक या नाट्यालेख नाटकीय शब्द का मूर्त रूप है। इसे रंग-कर्म से स्पंदित आलेख भी कह सकते हैं। नाटक से रंग-कर्म तक यह स्पन्दन आन्तरिक लय की तरह व्याप्त रहता है। नाटक की ज्ञान है और प्रस्तुति में इसे पकड़ने के लिए निर्देशक और अभिनेता जी-जान से जूझते हैं। रंग-कर्म का पूरा ताप-झाप इस अमूर्त से स्पन्दन को मूर्त करने की प्रक्रिया है। गति और दृश्य इसके बूते शब्द का हिस्सा बनते हैं और प्रस्तुति में आकार ग्रहण करते हैं। नाटक की अवधारणा के मूल में यही स्पन्दन है। इसके बिना नाट्यकृति बेजान है और रंग-कला अधूरी है।
About The Author
नाटकीय शब्द में रंगमंच के प्रारंभिक स्पन्दनों का वास है। इसमें रंग-भाषा की पहली ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं और इसी वजह से नाटककार को पहला रंगकर्मी कहा जाता है। नाटकीय शब्द या नाट्यालेख और रंग-कर्म एक दूसरे के संबल हैं, एक दूसरे के साथ जीते-मरते हैं। रंग-कला चाहे कितनी विकसित क्यों न हो। वह नाटकीय शब्द से ऊपर और निरपेक्ष नहीं है। उसके मूल में किसी न किसी रूप से नाट्य है। नाट्य है तो नाटक भी है। नाटक में गूंजने वाले शब्द और मंच पर उनके मूर्त होने की प्रक्रिया में नाटककार, निर्देशक, अभिनेता और दर्शक जुड़े रहते हैं। रचना-प्रक्रिया के दौरान नाटककार का ध्यान शब्द पर केंद्रित रहता है-ऐसा शब्द जिसमें गति और दृश्य खड़ा करने की सामर्थ्य हो। यही नाटकीय शब्द है-हरकतों और अनुगूजों भरा जो रंग-प्रक्रिया में अभिनय, प्रकाश-योजना और दृश्यांकन के ज़रिए विभिन्न रूपों में, अनेक संदर्भों और अर्थों में दृश्यमान होने लगता है और नाट्यानुभूति की सैंकड़ों दवियाँ भासमान होने लगती हैं।
डॉ. नरेन्द्र मोहन की यह कृति ‘नाटकीय शब्द और रंगमंच’ आधुनिक नाटक और रंगमंच में रुचि रखने वाले पाठकों, दर्शकों और शोधार्थियों के लिए एक ज़रूरी पुस्तक है।






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