प्रसाद और तांबे का काव्य (तुलनात्मक अध्ययन) - Prasaad aur taambe ka kaavy (Tulanaatmak Adhyayan)
Description
आधुनिकीकरण के कारण मानव का प्रकृति से नाता टूट चुका है। उस टूटे रिश्ते को वापिस जोड़ने का काम प्रसाद और तांबे करते हैं। प्रकृति की क्रोड़ में लौटने का संदेश वे देते हैं। प्रसाद यथार्थवादी और आदर्शवादी हैं जबकि तांबे आदर्शवादी कम और यथार्थवादी अधिक हैं। दोनों ने परवशता से कुंठित, दलित समाज का चित्रण किया है। साथ ही अकाल, विवाह की समस्या, बलिप्रथा, निर्धनता, दयनीयता, विषमता, कुंठावस्था, शोषण आदि विभिन्न समस्याओं का चित्रण भी किया है। एक ओर उन्होंने तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक दमनचक्र का यथार्थ चित्रण किया है तो दूसरी ओर प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का चित्रण कर आदर्श समाज व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत किया है।
प्रसाद और तांबे ने राष्ट्रप्रेम को उद्बुद्ध करने के लिए भारत के गौरवशाली इतिहास को प्रस्तुत किया है। जिससे भारतीय अपनी खोई हुई अस्मिता को पुनः प्राप्त कर सकें और उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना का उदय हो। दोनों आशावादी कवि हैं। उन्होंने तत्कालीन परिस्थितिओं की भर्त्सना करते हुए जनसाधारण में आशा की किरन उत्पन्न की। सत्ता का निषेध कर जनजागरण का आवाहन किया। विदेशी हुकूमत को समाप्त करने के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने का काम उन्होंने किया है। अँग्रेजी सत्ता, भौतिकवाद, यांत्रिक आविष्कार, महलों का शोषण आदि सभी का निषेध वे करते हैं।
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यांत्रिकता और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से ऊबकर प्रसाद आनंदलोक का संसार बसाते हैं तो तांबे व्यवस्था के ध्वंस की कामना कर आदर्श समाज की निर्मिति की मंगलकामना करते हैं। जिस प्रकार तुलसीदास रामचरितमानस में ‘रामराज्य’ का संसार बसाते हैं उसी प्रकार प्रसाद कामायनी में ‘आनंदलोक’ की सृष्टि करते हैं। मानवतावाद और जीवन दर्शन प्रसाद और तांबे के काव्य की श्रेष्ठता के दो अद्भुत और अनुपम पहलू हैं। उनकी कविता में लोकमंगल की भावना विद्यमान है तथा वह मानवता का पुरस्कार भी करती है। प्रसाद और तांबे युगप्रवर्तक वर्गचेतन कवि हैं। वे अपने युग का संपूर्णतः प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं तथा अपने समकालीन एवं परवर्ती कवियों का मार्गदर्शन भी करते हैं। प्रसाद और तांबे का काव्य कालजयी है।






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