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तू और मैं

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Author Name – गगन पंत
अरे, मेरे लिए कोई और इन्तजाम नहीं कर सकता, तो कम-से-कम, खुश तो हो जा कि मैं तुझसे मिलने आ गया। मुस्करा कर मेरी तरफ देख तो, मुझसे तू कोई बात भी नहीं कर रहा है। जब से मैं इस कमरे में तेरे पास आया हूँ तब से तू बस, ऐसे ही बैठा है। अरे! मुझे दिखा तो सही कि ये जगह कैसी है? यहां पर कौन-कौन लोग हैं? यहां तू क्या करता है? तेरे घर में सब कैसे हैं? कुछ बताएगा भी या मैं जाऊँ? तब से केवल अजय ही बोले जा रहा था, अशोक तो लगातार मौन था। ‘जाऊँ’ शब्द सुनते ही अशोक को न जाने क्या हुआ, वह, एकदम से खडा होकर अजय से लिपट गया।

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तू और मैं

Description

अरे, मेरे लिए कोई और इन्तजाम नहीं कर सकता, तो कम-से-कम, खुश तो हो जा कि मैं तुझसे मिलने आ गया। मुस्करा कर मेरी तरफ देख तो, मुझसे तू कोई बात भी नहीं कर रहा है। जब से मैं इस कमरे में तेरे पास आया हूँ तब से तू बस, ऐसे ही बैठा है। अरे! मुझे दिखा तो सही कि ये जगह कैसी है? यहां पर कौन-कौन लोग हैं? यहां तू क्या करता है? तेरे घर में सब कैसे हैं? कुछ बताएगा भी या मैं जाऊँ? तब से केवल अजय ही बोले जा रहा था, अशोक तो लगातार मौन था। ‘जाऊँ’ शब्द सुनते ही अशोक को न जाने क्या हुआ, वह, एकदम से खडा होकर अजय से लिपट गया।

About the Author

इधर दोनों अपने से बेखबर, अपनी सुध-बुध खो, अपने विचारों में गुम थे। अजय का मुँह खिडकी की तरफ था और अशोक, जो कि जमीन पर बैठा था, का मुँह उस ओर था जिधर अजय की पीठ थी। दोनों बिल्कुल शान्त बैठे आगे की सोच रहे थे। इतने में ही अजय हड़बड़ा कर उठा और लगभग दौडता हुआ खिडकी के पास आया। वह खिडकी से अन्दर झांकने की कोशिश कर रहा था और पूरे शरीर को थोडा किनारे कर के खिडकी से अपने को छुपा भी रहा था। यह सब, पलक झपकते ही हो गया था। अजय अभी भी बिल्कुल खिडकी से चिपक के खडा था। अशोक उसके इस प्रकार से अचकचा कर उठने और खिडकी से भीतर देखने को हैरान होकर देख रहा था।

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