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  • Saat Desh Mein Aurat ( Kaavy Sangrah )
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सात देश में औरत (काव्य संग्रह)

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Author Name –  Dr. Ram Pravesh Rajak

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सात देश में औरत ( काव्य संग्रह ) : Saat Desh Mein Aurat (Kaavy Sangrah)

Description

Saat Desh Mein Aurat ( Kaavy Sangrah )

“केदारनाथ उन कालजयी कवियों में हैं जो अपने काव्य के माध्यम से संस्कृति का उन्नयन, भाषा की यथार्थ नई भंगिमा, लोक-जीवन एवं लोक-गीतों का समाहार, अभिजात्य एवं लघुजीवन के यथार्थ तथा काव्य में नवजीवन का संचार करते हैं। जिनके विषय में अनेक समर्थ, अनुभवी और योग्य लोगों के द्वारा इतना कुछ लिखा गया है कि मेरे जैसे एक आम पाठक के लिए उन पर कुछ भी लिखना कागज काला करने जैसा ही होगा। किसी भी महान और स्थापित कवि

के विषय में लिखना बेहद मुश्किल कार्य है। कविता की रूह की गहराइयों में बसे कवि के बारे में लिखना उतना ही मुश्किल है जितना माँ का बच्चे के प्रति प्रेम को अभिव्यक्त करना क्योंकि मॉ अपने ही रक्त-मॉस से अपने बच्चे का निर्माण करती है। और एक कवि भी अपने भावबोध, संवेदना एवं अनुभव से गुजरते हुए निर्मित करता है शिशुरूपी कविता। उसके संवेगों की वाहक होती है उसकी कविता। काव्य की दृष्टि से इनका व्यक्तित्व न केवल आधुनिक कवियों में अपितु उत्तर आधुनिक हिंदी साहित्य में बेजोड़ है। वह एक उच्चकोटि के अध्यापक, वक्ता, मानवतावाद एवं समत्व भावना के प्रचारक श्रेष्ठ कवि के रूप में याद किये जाते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी कविताओं में मौजूद अनुगूँज हमें बार-बार अपनी कविताओं की ओर खींचती है। एक कवि अपनी रचना लिखता है और समय के साथ आगे बढ़ जाता है लेकिन रचनाएँ उसे पुनर्जीवन प्रदान करती हैं। उनके नए पाठ होते हैं, पाठक नवीन दृष्टिकोण से काव्य की विवेचना अपने समय के संदर्भों से करता है। रचनाकार ने रचना लिखकर जिस वक्त पाठक के समक्ष प्रेषित की, बस उसी क्षण रचना पाठक की हो गई।”

About The Author

भाषा के हम विद्यार्थी हैं आप उस कविता को पढ़ें क्या आज ऐसा नहीं हो रहा । कलकत्ता शहर  की जो स्थिति है इससे  क्या दुनिया वाकिफ नहीं है  डिजीटल युग की ये क्या त्रासदी नहीं है कि अब किताब में कविता नहीं किताब पर कविता लिखी जा रही। नदियां जो किसानों को जीवन दान देती हैं बाढ़ के कारण क्या अब वह तबाह नहीं हो रहें हैं प्रदुषण क्या अपने चरम पर नहीं,क्या मानसून अब समय पर आता?, क्या तकिया के निचे मां अपको बुरे  सपने न आये  इसके लिए सरोता नहीं रखती थी, युवाओं के सफेद रंग के बाल क्या चिंता का विषय नहीं या कवि के नाम जानकार  आज भी संपादक कविता बिना देखे क्या नहीं छापता  है यह होता है, आज कितने लोग, कितनों को दावत देते हैं। आज कितने लोग अपनी मातृ‌ भाषा जानते आज एक औरत क्या कटघरे में नहीं; सातों देशों में औरत को कितना पूजा जाता है. स्त्री को अकेला पाकर कौन पुरुष उसे अपने हवस का शिकार नहीं बनाना चाहता देश-विदेश हर जगह औरत भोग्या ही है

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