कबीर का पुनर्पाठ - Kabeer ka Punarpaath
Description
कवीर हिंदी के उन प्रारंभिक कवियों में से हैं जो बंगाल के रास्ते यूरोप पहुँचते हैं। कबीर का यह दुर्भाग्य रहा कि बाहर के लोगों ने उन्हें पहले पहचाना और घर के भीतर ही उन्हें कवि मानने को लेकर भारी झगड़ा होता रहा। कबीर की पढ़ाई लिखाई का प्रमाण पत्र खोजने वालों की कमी नहीं थी। विनम्रता को कमज़ोरी और गाल बजाने वालों को विद्वान मानने वालों की कमी न पहले थी, न अब है। कबीर को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बुद्ध के बाद भारत की इतिहास धारा को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला व्यक्तित्व ऐसे ही नहीं माना था। कबीर पंथ पर भरोसा करने वालों को भारत पंथी का नाम भी इस बात का प्रमाण है कि कवीर जैसे कवि किसी भाषा को हज़ारों साल की साघना के बाद मिलते हैं।
कबीर जैसे कवि हिंदी में जितने सरल और लोकप्रिय दिखते हैं, अकादमिक जगत के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती बन कर उभरे हैं। आचार्य क्षितिमोहन सेन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, श्यामसुंदर दास, पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध और धर्मवीर सरीखे प्रबुद्ध लोगों की नज़र ने कबीर के काव्य संसार में जिन अनमोल रत्नों की तलाश का सिलसिला जारी रखा है उसी कड़ी में पुरुषोत्तम अग्रवाल के इस अध्ययन के बहाने वर्षा गुप्ता ने कबीर के पाठ, कुपाठ और पुनर्पाठ का जो मूल्यांकन किया है वह कबीर अध्ययन की परंपरा का एक सार्थक और सुसंगत मूल्यांकन है।
गजेन्द्र पाठक
प्रोफेसर, हिंदी विभाग
हैदराबाद विश्वविद्यालय
About The Author
डॉ. वर्षा गुप्ता
जन्म एवं स्थान: 7 जून, 1989, दरभंगा (बिहार)
शिक्षा :
बी.एड., एम.ए. (हिंदी साहित्य), एम. फिल्., पीएच-डी. (हिंदी साहित्य), स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा, स्नातकोत्तर पत्रकारिता डिप्लोमा।
सृजन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा समाचार पत्रों में लेख, कहानी, कविता, शोधपरक एवं आलोचनात्मक लेख प्रकाशित। विभिन्न राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता ।
सम्मान :
‘नारी शक्ति सागर सम्मान’,
‘लक्ष्मीबाई काव्य भूषण सम्मान’,
‘हिंदी काव्य रत्न सम्मान’,
‘भारतीय लघुकथा सम्मान’,
‘भारत के प्रतिभाशाली कवयित्री सम्मान’,
‘काव्य शिरामणि सम्मान’,
‘काव्य क्रांति सम्मान’






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