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ब्रह्मात्मज (महाकाव्य)

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Author Name – आचार्य देवेंद्र देव
भारत भक्त समाज’ के संस्थापक, पूज्यवर स्वामीजी हम जैसे राष्ट्रानुरागी वैरागियों के पथ प्रदर्शक, अनुकरणीय परिव्राजक और उन्नत आदर्श रहे हैं।

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आदि जगदाचार्य, नैमिष-व्यासपीठाधीश्वर स्वामी नारदानंद जी सरस्वती के जीवन पर आधारित ब्रह्मात्मज (महाकाव्य)

Description

“भारत भक्त समाज’ के संस्थापक, पूज्यवर स्वामीजी हम जैसे राष्ट्रानुरागी वैरागियों के पथ प्रदर्शक, अनुकरणीय परिव्राजक और उन्नत आदर्श रहे हैं।

‘ब्रह्मात्मज’ महाकाव्य में कवि ने स्वामी जी के जीवन के समस्त पक्षों के साथ-साथ, गोरक्षा-आन्दोलन एवं अकाल पीड़ितों की सहायतार्थ, उनके द्वारा किये गये कार्य-कलापों और अन्यान्य भूमिकाओं का, सविस्तार, प्रभावशाली काव्य-चित्रण किया है। इस कारण यह महनीय महाकाव्य-कृति हमें विशेष अभिनन्दनीय लगी। महाकवि के अभिनव सारस्वत पुरुषार्थ-स्वरूप ‘ब्रह्मात्मज’ महाकाव्य का हार्दिक स्वागत करता हूँ तथा इसके रचनाकार प्रियवर आचार्य देवेन्द्र देव को साशीष साधुवाद देता हूँ।

– स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि (निवर्तमान जगदूरु शंकराचार्य, हरिद्वार)

आचार्य श्री देव का प्रस्तुत महाकाव्य ‘ब्रह्मात्मज’ उन्हीं आलोक-रश्मियों का नव्यतम प्रामाणिक अभिनन्दनीय ग्रन्थाभिलेख है

जिसका भक्त भावक, सुधी समाज में भव्य स्वागत होगा, ऐसी मेरा आशा ही नहीं, प्रबल विश्वास भी है।

– स्वामी उपेन्द्रानन्द सरस्वती (जगदाचार्य, नैमिष व्यास पीठाधीश्वर)

Caps

सचमुच आचार्य देव अनुपमेय है। उनकी रचनाओं में कभी कालिदास के लालित्य की अनुभूति होती है और कभी वाग्वश्यैवानुवर्तते के रूप में विख्यात भवभूति का स्मरण हो आता है।

‘ब्रह्मात्मज’ महाकाव्य ऐसे ही विशिष्ठ अनुपमेय महाकवि की प्रातिभ क्षमता का अनुपमेय अवदान है। उन्हें मेरी कोटि-कोटि साधुवाद, बधाइयाँ और साशीष शुभ कामनाएँ ।

डॉ. प्रेमी राम मिश्र,

(पूर्व प्राचार्य, संस्कृत महाविद्यालय, एटा)”

About The Author

” ‘ब्रह्मात्मज’ एक महाकाव्य ही नहीं, अपने प्रणेता महाकवि और उसकी ब्रह्मकीर्ति का छन्दोमय गान, विद्वद्विधान भी है।

यशस्वी महाकवि आचार्य देवेन्द्र देव ने जगदाचार्य स्वामी नारदानन्द जी में ब्रह्मात्मज तेज की प्रतिष्य कर उन्हें लोक-मंगल की कामना का कृती कारक निरूपित किया है। महाकवि आचार्य देवेन्द्र देव द्वारा प्रणीत, प्रस्तुत ‘ब्रह्मात्मज’ महाकाव्य लोक-मंगल का सांस्कृतिक विज्ञान और नवीन रचना का साहित्यिक सोपान सिद्ध हो, यह शुभकामना ।

– आचार्य सोम दीक्षित

(प्राक्तन अध्यक्ष, हिन्दी सभा, सीतापुर)

प्रस्तुत महाकाव्य-कृति की विरचना ‘का मूल उद्देश्य है ‘आत्मने मोक्षार्थ, ‘जगद्विताय च। इस योजना और कार्यान्वयन के लिए मैं महाकवि देव की भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा का अभिनन्दन करते हुए चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य के आधुनिक अधिष्ठाता-प्रतिष्ठाता ‘ब्रह्मात्मज’ महाराज नारदानन्दजी के चरित और चरित्र को शब्द-शब्द समोए इस महाकाव्यरूपी अक्षर-तीर्थ में आत्म-अवगाहन करते हुए पाठकों को भी इसमें निसर्ग-निमज्जन का निमन्त्रण देता हूँ।

– डॉ. राहुल अवस्थी,

(व्याख्याता, हिन्दी विभाग, गरेली)

महाकाव्य की प्रसादगुण युक्त भाषा सरल, सुबोध, शुद्ध साहित्यिक होने के साथ-साथ सहज सम्प्रेषणीय भी है। एक तपस्वी सिद्ध महापुरुष की जीवन-गाथा को पढ़ते हुए सहृदय पाठक अनायास ही महाकाव्य के नायक के सदृणों से प्रेरणा प्राप्त करता है तथा उसके भीतर सद्वृत्ति जाग्रत होती है, यही इस महाकाव्य का महत्तम प्रदेय, इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

– डॉ. गोपाल कृष्ण शर्मा ‘मृदुल’ (सम्पादक, ‘चेतना स्रोत’ त्रैमासिक,G328″

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