आश्वासन के विविध आयाम (साहित्यिक एवं सांस्कृतिक निबन्ध-संग्रह) - Aasvaadan ke vividh aayaam saahityik aur saanskrtik nibandh-sangrah
Description
डॉ. अमल सिंह ‘भिक्षुक’ का रुचि-क्षेत्र मुख्य रूप से आलोचना है। आलोचना रसास्वादन की प्रक्रिया को सुगम बनाती है। रचनाकारों को आलोचकों की जरूरत हो या न हो, पाठकों को आलोचना की जरूरत होती है। इसलिए कि आलोचना रचना को समझने-समझाने में पाठकों को मदद करती है और इस दृष्टि से आलोचक ‘भिक्षुक’ की लिखी हुई आलोचनाएँ कामयाब हैं। कारण कि इनकी लिखी हुई आलोचनाओं से गुजरने पर पाठकों में आलोचनात्मक संवेदनाएँ उभरती हैं।
आलोचना रचना से स्वतंत्र बौद्धिक कर्म है। इसलिए कवि की भाँति आलोचक भी कवियों के चुनाव में स्वतंत्र होता है। वह किसी कवि पर अधिक लिखता है, किसी कवि पर कम लिखता है और किसी-किसी कवि को नोटिस तक नहीं लेता है। डॉ. अमल सिंह ‘भिक्षुक’ अपनी इस आलोचनात्मक कृति ‘आस्वादन के विविध आयाम में मुख्य रूप से आधुनिक कवि और आधुनिक विधाओं का चुनाव किया है। आधुनिक कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद और बच्चन जैसे कवि हैं तो आधुनिक विधाओं में हिन्दी गीत, गज़ल, उपन्यास, लंबी कहानी और लघु कथाएँ हैं। पुस्तक में दलित विमर्श और स्त्री विमर्श पर केंद्रित आलोचनाएँ भी हैं।
कुल मिलाकर ‘आस्वादन के विविध आयाम अनेक रचनाओं और विधाओं की अर्थवत्ता तथा सार्थकता की खोज एवं पहचान करती है। डॉ. अमल सिंह ‘भिक्षुक’ की यह पुस्तक उन सभी को पढ़नी चाहिए, जिनकी रुचि आलोचना-कर्म में है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह
भाषा वैज्ञानिक, आलोचक तथा
इतिहास-मर्मज्ञ
प्रोफेसर, हिंदी-विभाग
एस.पी. जैन कॉलेज, सासाराम-821115
(बिहार) भारत।
About The Author
आलोचना के क्षेत्र में नये आलोचकों की एक सकारात्मक भूमिका है। अक्सर यह देखा गया है कि रचना के क्षेत्र में जिस मात्रा में नयी प्रतिभाएँ आती हैं, आलोचना के क्षेत्र में उसकी तुलना में कम प्रतिभाएँ आती हैं। आलोचना एक दुष्कर और श्रमसाध्य अनुशासन है और रचना की अपेक्षा अधिक श्रमसाध्य और अध्ययन परक। यही कारण है कि आलोचक सही अर्थों में, कम ही होते हैं और यह अच्छा ही है। रचनाकार अधिक हों, यह साहित्य के स्वास्थ्य के लिए उचित है। मैं इन नये आलोचकों को महत्व देता हूँ। हम आलोचक उम्र की कगार पर हैं, इन्हीं नये आलोचकों पर भविष्य का सृजन निर्भर करेगा।
डॉ. अमलसिंह ‘भिक्षुक’ एक ऐसे नये आलोचक हैं, जिनकी आलोचना-दृष्टि विश्लेषणात्मक एवं वैज्ञानिक है। इनके व्यावहारिक और सैद्धांतिक आलोचना से संबंधित कृतियों में व्याख्यात्मक प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं जिसमें व्याख्या, विश्लेषण तथा संवेदना-इन तीनों तत्वों का सम्यक् समाहार है। मेरी दृष्टि में, ‘आस्वादन आलोचना का विशिष्ट गुण है और इस गुण का दिग्दर्शन हमें भिक्षुक की कृतियों में प्राप्त होता है। वे कोई भी बात हवा में नहीं कहते हैं, यह तथ्य मैंने प्राप्त किया है।
संक्षेप में, मैं समझता हूँ कि डॉ. भिक्षुक अपने विश्लेषण तथा विवेचन को और विकसित कर सकते हैं। दूसरी विशेषता मुझे यह लगती है कि इन्होंने रचनाकारों की पुस्तकों का हवाला तो दिया है. पर साथ में अपने स्वतंत्र विचार भी रखे हैं जो एक आलोचक की दृष्टि का परिचय देते हैं।






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