अथर्वः एक महाक्रांति, अथर्व मैं वही वन हूं - Atharvaah ek mahaakraanti atharva main vahee van hoon
Description
प्रो. गोरास्या को आनंद जी के साथ दीर्घकाल तक इतिहास, दर्शन, अध्यात्म एवं साहित्य पर संवाद करने का सौभाग्य मिला है। अस्तु, अधर्वा जैसे गंभीर काव्य की इस गंभीर समालोचना से सुधीजन अवश्य लाभान्वित होंगे।
डॉ सुभाष चन्द्र राय, विभागाध्यक्ष हिन्दी, विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन
श्री गोरास्या अंग्रेजी के प्राध्यापक हैं फिर भी उन्होंने हिन्दी में इस पुस्तक की तात्विक मीमांसा की, यह पहली क्रांति है।
प्रारंभ में वामपंथी रुझान होने के बावजूद अपनी ज्ञानात्मक संवेदना को अध्यात्म के धरातल पर लाकर उसे कला में सान्द्रित कर दिया, यह उनके जीवन की दूसरी बड़ी क्रांति है और डब्ल्यू.बी. वेट्स, टी.एस. इलियट, एजरा पाउंड और जेम्स ज्वॉयस जैसे रचनाकारों को पढ़ाने वाला प्राध्यापक अगर प्रो. आनंद की अद्वितीय रचना ‘अधर्वा’ पर अपने सघन चिंतन के संसार को केन्द्रित करते हुए एक नवजीवन का उद्घोष करता है तो यह ‘महाक्रांति’ से कम क्या हो सकता है!
प्रो. वी. के. मंगलम्
हिन्दी विभाग, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना
“”अथर्वा मैं वही वन हूं”” एक कालजयी रचना है जिसे किसी ने रचा नहीं। इसने स्वयं आनंद कुमार सिंह के रहस्यमय मस्तिष्क को पकड़ लिया और उतर आयी ब्रह्मांडीय शब्दकोश से निकलकर पृथ्वी पर। मुझे पता है यह प्रो. गोरास्या के पास से निकल कर किसी और को अपने तिलिस्म में आकर्षित करने निकल चुकी है।
डॉ एम डी सिंह, कवि और चिकित्सक, ग़ाज़ीपुर
“”अथर्वाः में वही वन हूँ”” पारंपरिक महाकाव्य का आधुनिक संस्करण है जिसमें अध्यात्म के गहन तत्त्वों को नए बिम्बों और नव प्रतीकों में सृजित किया गया है। इस महाकविता की सरल भाषा में अभिव्यक्ति की महती आवश्यकता थी जिसे डॉ. लक्ष्मण सिंह गोरास्या ने संभव करने का सार्थक प्रयास किया है।
प्रो. हरिमोहन बुधौलिया,
पूर्व विभागाध्यक्ष (हिंदी अध्ययनशाला), विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन
श्री अरविंद की “”सावित्री”” की काव्यात्मकता का सहज प्रतिविम्ब एक ओर प्रो. आनन्द रचित “”अधर्वा”” में झलकता है तो दूसरी ओर उसकी धवल तरंगें प्रो. गोरास्या जी की इस समालोचनात्मक कृति में भी विद्यमान हैं। “”अथर्वा मैं वही वन हूँ”” के साथ ही प्रो. गोरास्या की यह समांतर कृति भी साहित्यानुरागियों के लिए समान रूप से संग्रहणीय होगी।
प्रो. हरिकेश सिंह पूर्व कुलपति,
जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा (सारण)






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