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बीसवें सदी के अंतिम दशक के देहाती युवा-मन की कहानियां धूप से जले सूरजमुखी

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Author Name – भगवान दास मोरवाल
भगवानदास मोरवाल की कहानियाँ आज के सामाजिक और आर्थिक संदर्भों से जुड़कर अपनी बात कहती हैं। इन्हें हम आज के समय के ‘सच’ के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि कथाकार स्वयं जिस जीवन के बीच खड़ा है, उसी को बगैर लाग-लपेट के सामने ले आता है। एक गुण इन कहानियों का यह भी है कि कथाकार पात्र गढ़ता नहीं है, न ही झूठे अहम् के तहत पात्रों को अनुशासन में जकड़ता है, बल्कि वह तो पात्रों के साथ होकर, उनकी जीवन-यात्रा का सहभागी बन जाता है।

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बीसवें सदी के अंतिम दशक के देहाती युवा-मन की कहानियां धूप से जले सूरजमुखी

Description

“भगवानदास मोरवाल की कहानियाँ आज के सामाजिक और आर्थिक संदर्भों से जुड़कर अपनी बात कहती हैं। इन्हें हम आज के समय के ‘सच’ के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि कथाकार स्वयं जिस जीवन के बीच खड़ा है, उसी को बगैर लाग-लपेट के सामने ले आता है। एक गुण इन कहानियों का यह भी है कि कथाकार पात्र गढ़ता नहीं है, न ही झूठे अहम् के तहत पात्रों को अनुशासन में जकड़ता है, बल्कि वह तो पात्रों के साथ होकर, उनकी जीवन-यात्रा का सहभागी बन जाता है।

– धर्मेन्द्र गुप्त, संपादक

विषय वस्तु (त्रैमासिक)

अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर 1986 एवं जनवरी-फरवरी-मार्च 1987 (संयुक्तांक)

इन कहानियों की विशेषता यह है कि ये ग्रामीण वातावरण को उसकी समग्रता में उकेरती हैं। लेखक के कहानी कहने का अंदाज़ भी प्रभावित करता है। इस अर्थ में ये कहानियाँ, कहानी की एक बुनियादी शर्त को पूरा करती हैं। इन कहानियों में गाँव और शहर के निम्नवर्गीय चरित्र हैं जो क्रमशः टूट रहे हैं। उन पर अभावों और असफल संघर्ष से उपजे गहन अवसाद की छाया है।

-डॉ. हेमंत कुकरेती

दैनिक हिंदुस्तान ; 21 जुलाई, 1991″

About The Author

“भगवानदास मोरवाल की कहानियों में सामाजिक तबकों का, सकारात्मक विचार-प्रणाली और नकारात्मक मूल्य-व्यवस्था का विभाजन लगभग सही ढंग से होता है। हमें कहीं भी महसूस नहीं होता कि लेखक किसी बात को अनावश्यक तूल दे रहा है, किसी प्रसंग में रस ले रहा है, या ऐसे पूर्वाग्रह का शिकार है कि समाज के महत्वपूर्ण पक्षों को नज़रंदाज़ कर देता हो। समकालीन लेखन में यह संवेदनशीलता, नैतिक मूल्यों की यह समझ स्वागत एवं समर्थन के योग्य है। रचनाकारों को शोषक और शोषित, गलत और सही, गरिमामय और गरिमाहीन के मध्य एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी।

-डॉ. आनंद प्रकाश

नया पथ (मासिक)

जनवरी-फरवरी-मार्च 1991

भगवानदास मोरवाल की कहानियाँ न तो प्रयोग का रास्ता बनाती हैं और न ही प्राचीनता के मोह से आबद्ध हैं। भाषा की सहजता, स्थितियों की गंभीरता और आज के गूढ़ सवालों से दो-चार होता मोरवाल का कहानीकार अपने कथन के प्रति ईमानदार है, तो उसे प्रशंसा की दृष्टि से देखना ही चाहिए और यह माना जाना चाहिए कि कथाकार में यथास्थिति से लोहा लेने और सृजनशील विचार-दृष्टि की समझ अभी शेष है।

– डॉ. ज्योतिष जोशी

साप्ताहिक हिंदुस्तान ; 9 जून, 1992″

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