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भारतेन्दु एवं द्विवेदी युगीन स्त्री काव्य लेखन

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Author Name – Dr. Kapil Kumar Gautam
हिन्दी साहित्येतिहास में आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक पुरुष साहित्यकारों के मध्य अनेक महिला साहित्यकार भी विद्यमान रही हैं।

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भारतेंदु एवं द्विवेदी युगीन स्त्री काव्य लेखन- Bhaaratendu evan dvivedee yugeen stree kaavy lekhan

Description

हिन्दी साहित्येतिहास में आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक पुरुष साहित्यकारों के मध्य अनेक महिला साहित्यकार भी विद्यमान रही हैं। यह पुस्तक इतिहास के पन्नों से विलुप्त लेखिकाओं को प्रकाश में लाने का प्रयास करती है। इस पुस्तक में भारतेंदु एवं द्विवेदी युगीन कवयित्रियों को संकलित करते हुए, उनके काव्य का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। भारतेंदु एवं द्विवेदी युग में स्त्री-काव्य लेखन का विस्तार राजघरानों से लेकर मध्य वर्गीय प्रतिष्ठित परिवारों तक होने लगा था। भारतेंदु एवं द्विवेदी युगीन चयनित कुल 20 कवयित्रियों में महारानी वृषभानु कुँवरि, महारानी कमल कुमारी ‘जुगल प्रिया’, बाघेली रणछोर कुँवरि, बाघेली विष्णुप्रसाद कुँवरि, रत्नकुँवरि बाई, चन्द्रकला बाई, महारानी रघुराज कुँवरि ‘रामप्रिया’, महारानी गिरिराज कुँवरि, राजमाता दियरा रानी रघुवंश कुमारी, निधि रानी और रूपकुमारी चंदेल राजपरिवारों से संबंधित थीं। जबकि हेमंत कुमारी चौधरानी, राजरानी देवी, सरस्वती देवी ‘शारदा’, गुजराती बाई ‘बुंदेल बाला’, गोपाल देवी, रमा देवी, राजदेवी, ज्वाला देवी और रामेश्वरी नेहरू का सम्बन्ध धनी और प्रतिष्ठित परिवारों से था

About The Author

“इस रूप में भारतेंदु एवं द्विवेदी युगीन कवयित्रियों की राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक एवं साहित्यिक पृष्ठभूमि पृथक-पृथक थी। राजपरिवार की स्त्री भागवत भक्ति परक काव्य लिख रही थीं।

उनके काव्य में कहीं-कहीं प्रसंगवश सामाजिक बुराइयों के प्रति विरोध भी दिखाई देता है। किन्तु जिन कवयित्रियों का सम्बन्ध राजपरिवारों से नहीं था, उनके काव्य में युगीन चेतना दृष्टिगत होती है। ये कवयित्रियाँ राष्ट्रीय चेतना, स्त्री-चेतना और सामाज सुधार जैसे विषयों को लेकर काव्य लेखन कर रही थीं। इन कवयित्रियों के काव्य में लोक, समाज, संस्कृति, नीति, भक्ति और प्रकृति का चित्रण भी किया गया है। काल के प्रभावानुरूप कुछ कवयित्रियाँ खड़ीबोली की ओर बढ़ रही थीं और कुछ ने ब्रजभाषा एवं अन्य क्षेत्रीय बोलियों को ही काव्य का माध्यम बनाया हुआ था। ऐसे ही तथ्यों को सहेज कर यह पुस्तक लेखिकाओं की विलुप्त कड़ियों को जोड़ते हुए, हिन्दी साहित्येतिहास को समग्रता प्रदान करती है।

प्रो. चंदा बैन”

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