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Culture of Resistance and Hindi Poetry

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Author Name: Vijay Narayan Mani
संस्कृति’ अपने आप में शोधन, परिवर्धन, परिष्करण का पर्याय है। यह किसी समाज को परिष्कृत कर, उसकी अस्मिता निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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प्रतिरोध की संस्कृति और हिंदी कविता- Culture of Resistance and Hindi Poetry

Description

“संस्कृति’ अपने आप में शोधन, परिवर्धन, परिष्करण का पर्याय है। यह किसी समाज को परिष्कृत कर, उसकी अस्मिता निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिससे वैश्विक पटल पर उक्त समाज की पहचान निर्मित होती है। इस तरह से संस्कृति मानव निर्मित, अस्मिताकारी सकारात्मक ऊर्जा है। जो समूचे समुदाय को संचालित करती है।

‘प्रतिरोध की संस्कृति’ के बारे में भी कुछ इसी तरह की बात कही जा सकती है। क्योंकि प्रतिरोध में सकारात्मक ऊर्जा सन्निहित रहती है। साहित्य में व्यक्त प्रतिरोध के स्वरुप् के संबंध में यदि बात की जाय तो, इसका उद्देश्य बाधा या रूकावट उत्पन्न करना नहीं है। बल्कि सामाजिक प्रगति एवं उन्नति में जो बाधक या प्रतिगामी शक्तियाँ है। उसका प्रतिरोध कर, समतामूलक, भेद भाव रहित राष्ट्र का निर्माण करना है।

साहित्यकार की सूक्ष्म दृष्टि सामाजिक, राष्ट्रीय प्रगति में बाधक, शक्तियों एवं तत्वों की पहचान कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक में ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का अध्ययन ‘हिंदी कविता’ में किया गया है। इस अध्ययन क्रम में यह देखने को मिलता है कि भिन्न-भिन्न कालों में प्रतिरोध के विषय भिन्न-भिन्न रहे है। जिसका विस्तार से विवेचन विश्लेषण प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है। इसका अध्ययन करते हुए हम पाते है कि अब तक के सामाजिक विकास क्रम में सामाजिक सांस्कृतिक रूप से जागरूक,”

About The Author

“साहित्यकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने समाज में स्थित प्रतिगामी शक्तियों को पहचान कर, लोगों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया है। इन्होंने मात्र ध्यान आकृष्ट करने का ही कार्य नहीं किया है। बल्कि अपनी रचनाओं के माध्यम से ‘प्रतिरोध की वैचारिकी’ को निर्मित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रतिरोध में ‘वैचारिकी’ का होना महत्वपूर्ण है। यह इसे सचेतनता, जागरूकता तथा बौद्धिकता से जोड़ता है। इसी कारण से प्रतिरोध में कोरी भावुकता देखने को नहीं मिलती। इसमें ‘भावात्मकता’ और ‘बौद्धिकता’ दोनों का मेल होता है। इसी कारण से यह ‘रचनात्मक शक्ति’ है। जो सामाजिकों में ‘रचनात्मक ऊर्जा’ का संचार करती है। जिससे व्यक्ति, समाज तथा अपने भीतर की प्रतिगामी शक्तियों को पहचान कर, उसका व्यक्तिगत स्तर पर परिष्करण तथा सामाजिक स्तर पर प्रतिरोध कर, बहुत से बाधाओं को पार करके निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यह प्रक्रिया निरंतर जारी है।

इस कारण से ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ का अध्ययन भी एक गत्यात्मक क्रिया है। जो निरंतर जारी रहती है। अतः इसके अध्ययन की पूर्णता का दावा करना, अपनी अज्ञानता को प्रदर्शित करना है।”

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