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Dwarika Prasad Maheshwari Rachanawali Vol 2

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Author Name – Dr. Om Nischal, Dr. Vinod Maheshwari
पर्याप्त कविताएं, गीत, प्रबंध काव्य और मुक्तकों का सृजन करने के बावजूद द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी मुख्यतः बच्चों के रचनाकार के रूप में ही जाने-पहचाने जाते रहे हैं।

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द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली खंड 2 - Dwarika Prasad Maheshwari Rachanawali Vol 2

Description

“पर्याप्त कविताएं, गीत, प्रबंध काव्य और मुक्तकों का सृजन करने के बावजूद द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी मुख्यतः बच्चों के रचनाकार के रूप में ही जाने-पहचाने जाते रहे हैं। उनके सान्निध्य में रहने का यह सुफल रहा कि एक ऐसे रचनाकार को बहुत निकट से देख सका जो कि पूर्णतया अपने शिक्षण कर्म और रचना कर्म को समर्पित रहा। आजादी के बाद जब हिंदी प्रदेशों में पाठ्यक्रम बनाए जा रहे थे हमारे पास कोई बना बनाया मॉडल न था।

देश की राजभाषा हिंदी को बनाये जाने से पहले वे सन 1943 से ही शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश से जुड़ चुके थे। प्रदेश के शिक्षा विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए उन्हें यह अनुमान हो चला था कि पाठ्यक्रमों के निर्माण के लिए जिस तरह के प्रतिभावान शिक्षाविद चाहिए वे मुश्किल से उपलब्ध हैं। माहेश्वरी जी ऐसे में उन शिक्षकों में थे जिनके पास जीवन के प्रतिमान थे, गांधीवादी जीवनशैली थी। पुरखों के बताए सदाचरण थे।

शिक्षा की नींव कैसे स्थापित हो कि बच्चे राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप ढल सकें, देश के प्रति, वसुंधरा के प्रति, मनुष्यता के प्रति उदार हो सकें, भाषाओं को सीखने की ललक हो, देश को एक मानने का जज़्बा हो, पाठ्यक्रमों के जरिए शिक्षा के ऐसे प्रतिमान स्थापित हों कि बच्चों के साथ देश का भी निर्माण हो।

आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मोर्चों पर देश आत्मनिर्भर हो सके-इन बातों से माहेश्वरी जी सदैव चिंतित रहे व बच्चों के पठन-पाठन, कल्पनाशीलता के विकास व चरित्र निर्माण के प्रति निरंतर सचेत रहे। उनका बाल साहित्य उनके इस चिंतन-मनन का परिचायक है।”

About The Author

“द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी विभिन्न पाठ्यक्रम समितियों में रहते हुए इस बात से अवगत थे कि शिक्षा में आमूल परिवर्तन के लिए बहुत बुनियादी कार्य किए जाने हैं क्योंकि मैकाले ने भाषाओं के बीच व नागरिकों के बीच भाषा को लेकर जो दुर्भावना के बीज बोए उनके दुष्परिणाम हम आज तक भुगत रहे हैं। हिंदी इस देश की राष्ट्रभाषा व राजभाषा होने के बावजूद उस स्तर पर नहीं पहुंच पाई जो उच्च शिक्षण, तकनीक, चिकित्सा, इजीनियरिंग आदि की पढ़ाई के लिए अनुकूल हो। माहेश्वरी जी ने ऐसे समय पाठ्यक्रम समितियों में रह कर बच्चों के नैतिक सामाजिक, बौद्धिक उत्थान के लिए बहुत बड़ा काम किया। खुद उनका बाल साहित्य इस बात का साक्षी है। ‘इतने ऊँच उठो कि जितना उठा गगन है।’ एक बार संसद के सम्मुख उनका यह गीत गाकर शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्रगल ने पूरा वातावरण ही झंकृत कर दिया था।

ऐसे माहेश्वरी जी के बालगीत जब बच्चों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बने तो बहुत पसंद किए गए।

उनके भीतर बाल मनोविज्ञान के अनेक तत्व थे जिन्हें बच्चे बहुत पसंद करते थे। फिर धीरे-धीरे वे उत्तर प्रदेश की बाल पाठ्य पुस्तकों से बाहर निकल कर पूरे देश के हिंदी प्रदेशों व एनसीईआरटी द्वारा बनाए जाने वाले पाठ्यक्रमों में आए। वे देशव्यापी होते गए। आज आप कहीं की भी पाठ्यपुस्तक उठा लीजिए, उन्हें किसी न किसी रूप में पाठ्यपुस्तिकाओं में जरूर पाएंगे।

इस खंड में बाल कविताओं का उनका विपुल संसार समाहित है। चार से चौदह साल के बच्चों के लिए मूल्यपरक बालगीतों की रचना में उनका कोई सानी नहीं है। रचनावली का यह दूसरा खंड उनके साहित्यिक अवदान का एक महत्वपूर्ण सोपान है।”

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