गिद्धों का स्वर्णकाल (व्यंग्य संग्रह)
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“कविवर। जहर जहर से कटता है, लोहा लोहे से करता है। कविता से कविता कटती है, विचार से विचार कटता है, लेकिन कविता से युद्ध नहीं करता। तुम्हारे पास न जहर है और न युद्ध। तुम्हारे पास कुछ जहर था भी तो तुमने उसे दूसरे कवि की समीक्षा में खपा दिया। कुछ और वचा तो उसे पुरस्कार से वंचित रखने में एंटी-वैक्सीन का प्रयोग किया। फिर तुम किस बल पर युद्ध की खिलाफत करने चले हो? कविताएँ भी वही सफल हुई हैं जो युद्ध के पक्ष में लिखी गई हैं। कवि हो, कुछेक महाकाव्य तो पढ़े ही होंगे तुमने। माना तुम दूसरों का लिखा नहीं पढ़ते, परंतु नाम तो सुना होगा।
कविवर ! युद्ध के अनेक लाभ होते हैं। जीतने वाला राष्ट्रनायक बनता है और हारने वाला शहीद । युगों-युगों तक दोनों की पूजा होती है। चौराहों पर ऊँची-ऊँची मूर्तियाँ लगती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था हो तो सात पुश्तें सत्ता पाती हैं। उनके नाम पर विश्वविद्यालय, बाजारों, इमारतों एवं सड़कों का नामकरण होता है। उसकी स्मृति में शांति-अहिंसा टाइप के पुरस्कार शुरू किए जाते हैं, जिसके निर्णायक भी उसी के परिवार या पार्टी के होते हैं। उसके नाम पर पाठ्यक्रम में अध्याय जोड़े जाते हैं। इस प्रकार उस मुल्क का इतिहास समृद्ध होता है।”






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