हरिवंश राय 'बच्चन' की आत्मकथा - Harivansh raay bachchan kee aatmakatha
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बच्चन के कवि रूप के हर पक्ष को आलोचकों, शोधार्थियों ने अपनी-अपनी दृष्टि से विवेचित विश्लेषित किया और उनमें निहित संघर्षों में भी अचल रही जिजीविषा, नियति की अपरिहार्यता में आस्था और स्वयं की सामर्थ्य और कर्मनिष्ठा पर विश्वास तथा जर्जर परंपराओं एवं रूढ़ियों की जकड़न से मुक्त व्यक्तित्व से पाठकों की पहचान करायी किंतु उनके गद्य साहित्य पर अपेक्षित कार्य न होने से संघर्षपूर्ण जीवन में भी अनवरत सहज भाव से साहित्य- सृजन करने वाले अति सामान्य से अति विशिष्ट बने ‘बच्चन’ को सम्यक् रूप में नहीं जाना जा सका। अपने सु और कु दोनों रूपों की सहज व्यामोह रहित स्वीकृति उनकी महानता की संस्तुति करती है। समय के साथ भावों की परिपक्वता और उत्तरोत्तर तराशी जाती भावाभिव्यक्ति भावक को बहुत कुछ सिखाती, बताती है। उसे जीने की सही दिशा-निर्देशित करती है। उनकी आत्मकथा उनकी कविताओं सदृश अपने पाठकों को धैर्य, साहस और कर्मठता का संदेश देती है।
लेखिका : प्रो० रुचिरा ढींगरा






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