हज़ार रंग में डूबी हुई हवा (राही मासूम रज़ा के सृजन-कर्म पर केंद्रित): Hazaar rang mein doobee huee hava (raahee maasoom raza ke srjan-karm par kendrit)
Description
जिन्दगी से ऐसा रिश्ता जिसमें आप एक दूसरे को आजमाते रहते हैं यानि जिन्दगी एक चुनौती बार-बार आपकी ओर उछालती है और देखना चाहती है कि चुनौती के सामने आप छोटे पड़ जाते हो कि बड़े। राही साहय इस चुनौती में बड़े साबित हुए। राही साहब ने अपनी शर्तों पर अपनी तरह से बहुत धीरे-धीरे बहुत सारी वक्त की आज़माइश पार करते हुए अपनी जगह बनायी। वे शीर्ष पर पहुँचे और शीर्ष पर पहुँच कर साहित्य और जमीर दोनों सलामत रखा। फिल्मी बाज़ारू दुनिया में बहुत कुछ खोना पड़ता है क्योंकि यह एक बड़ा बाज़ार है, इसको समझते हुए भी राही साहब ने अपनी जगह अपनी तरह से बनाई।
मैंने राही साहब को सबसे पहले उनके उपन्यास ‘आधा गाँव’ से जाना और आश्चर्यचकित हुआ कि आधा गाँव में पूरे समाज और इंसान की पूरी तस्वीर कोई कैसे खींच सकता है। ‘आधा गाँव’ भारत की उस आबादी को उभार कर सामने लाता है जिसको अल्पसंख्यक कहकर किनारे कर देते हैं। असल में जो अल्पसंख्यक मानते हैं उनकी सोच अल्पसंख्यक है। इंसान अल्पसंख्यक होता ही नहीं, वह तो अपने आप में पूर्ण इकाई है और उस पूर्ण इकाई को आँकने की कोशिश में, उसे सामने रखने की कोशिश में राही साहब ने ‘आधा गाँव’ लिखा। सन् साठ के अंतिम दिनों की बात है जब मैं बम्बई आया। उस समय मेरे लिए राही साहब ‘आधा गाँव’ का पर्याय थे लेकिन मुलाकात नहीं हुई थी। बाद में, हम रोज़ मिलते। कभी वह हमारे घर चाय पीते, कभी हम उनके घर चाय पीते।
एक नफासत थी उनके व्यक्तित्व में। उनके कुर्ते अब भी मुझे याद हैं, लखनऊ के कढ़ाई के कुर्ते। मैंने पूछा कितने के होते हैं तो उन्होंने कहा, मंगा दूँगा। सिगरेट भी बहुत नफासत से लगातार पीते थे। सुगंधित ज़र्दे का डिब्बा रहता था उनके पास। वह आकर्षक संस्कार वाले, नफीस और भव्य थे। बोलते बहुत सुंदर थे, उर्दू भाषा पर उनका अधिकार था।
एक बार मेरा व्याख्यान किसी अखबार में छपा कि मैं भारतीयता से छोटी किसी पहचान से अपने को जोड़ नहीं सकता। अन्य किसी पहचान से मेरा जुड़ाव हो, मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।
About The Author
राही साहब ने भी यह पढ़ा और बोले ‘भई, बड़ी गजब की बात कही आपने। में इस बात को कहने के लिये ‘आधा गाँव’ लिख गया लेकिन ऐसा सूत्र नहीं बना पाया जैसा आपने कहा।’ मैंने कहा ‘मुझे यह सूत्र आधा गाँव से ही मिला है।’
वह अलग दुनिया के बाशिंदे थे, मैं अलग दुनिया का। पर शायद एक ही सूत्र हमको जोड़ता था कि वह भी लिखते पढ़ते थे, मैं भी कुछ लिखता था। में उस समय धर्मयुग से जुड़ा था जिससे राही जी दिल से जुड़े थे।
धार्मिक संकीर्णता से राही जी को चिढ़ थी। आज का जो यह दौर है इस दौर में राही साहब की सबसे ज्यादा याद आती है। क्योंकि यह वह दौर है जब हिम्मत के साथ सच कहना और अपने सच पर टिके रहना यह दो कसौटियों हैं जो हर आदमी को परेशान कर रही हैं। फिल्म राइटर्स एसोसिएशन ने जब इमरजेंसी के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया तव बतौर सदस्य, राही ने विरोध करते हुए कहा, ‘मैं इसका विरोध करता हूँ और आप प्रस्ताव में यह दर्ज करिए।’ कायरता का चरित्र होता है कि कायरों के बीच में टिक पाती है और उसमें राही हो तो मुश्किल है। मुझे याद है उस दौर में कितने ही लोग थे जिन्होंने अपनी कलम गिरवी रखी थी, आवाज़ बेच दी थी, राही साहब उन लोगों में से नहीं थे। शायद राही साहब के साथ मेरे रिश्ते में जो मजबूती आई, वह इसलिए नहीं कि वह साहित्यकार थे और मैं भी कुछ लिखता पढ़ता हूँ बल्कि इसलिए कि कुछ अपने विश्वास हैं जो हम एक दूसरे के साथ साझा करते थे। राही साहब अगर आज होते और आज के दौर में उनसे हम कुछ पूछते तो उनकी राय पूछते। फिर वह क्या कहते, ऐसा सवाल मन में आता है लेकिन जवाब भी उनके एक शेर में मिलता है-
‘जहर मिलता रहा जहर पीते रहे रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे ज़िन्दगी भी हमें आज़माती रही और हम भी उसे आज़माते रहे






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