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Hindee Naatak Rang : Shilp

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Author Name – Dr. Brij Mohan ‘Barthwal
नाटक एक त्रि-आयात्मक विधा है जिसमें नाट्य-कृति, प्रस्तुति व सामाजिक तीनों का समन्वय नाटकीय कलात्मकता के लिए, अपेक्षित होता है।

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हिन्दी नाटक रंग : शिल्प - Hindee Naatak Rang : Shilp

Description

“नाटक एक त्रि-आयात्मक विधा है जिसमें नाट्य-कृति, प्रस्तुति व सामाजिक तीनों का समन्वय नाटकीय कलात्मकता के लिए, अपेक्षित होता है। अपने दृश्यात्मक शिल्प के कारण नाटक की कलात्मकता अन्य साहित्यक विद्याओं की तुलना में अधिक जटिल होती है। नाटक स्वयं में अनेक कलाओं को समेटे होता है जिसमें काव्य के अतिरिक्त गीत, संगीत, वाद्य, नृत, नृत्य, वेष-विन्यास, आलेख, दृश्य, अभिनयादि अनेक कलाओं का सम्मिश्रण होता है। इसीलिए सभी साहित्यिक रचनाओं का शिल्प मात्र लेखन तक ही सीमित रहता है परन्तु नाट्य-लेखन-कार्य लेखन पर ही समाप्त नहीं होता अपितु नाटक मंचित होने के पश्चात् ही पूर्णता को प्राप्त होता है।

नाट्य-शिल्प को रंग-शिल्प के नाम से भी अभिहित किया जाता है। रंग-शिल्प के संबंध में भ्रांति परिलक्षित होती है। अधिकतर आलोचकों व शोधार्थियों ने नाट्य-रचना-शिल्प को ही रंग-शिल्प माना है। ‘नटरंग’ पत्रिका के ‘रंग-शिल्प’ विशेषांक में दृश्यांकन, वेश-भूषा, ध्वनि व प्रकाशादि का ही विवेचन इसके अंतर्गत किया गया है जो पर्याप्त नहीं। इस प्रकार हम पाते हैं कि रंग-शिल्प की दो अवधारणएँ हैं प्रथम नाट्य-रचना-शिल्प तथा अन्य नाट्य-प्रस्तुति-शिल्प (मंचन-शिल्प)। अभी तक अधिकतर आलाचकों एवं शोधार्थियों ने नाट्य-रचना-शिल्प एवं नाट्-प्रस्तुति-शिल्प को समन्वित रूप में ही विवेचित किया है। यहाँ रंग/प्रस्तुति/शिल्प (मंचन-शिल्प) को ही विवेचित किया जायेगा।”

About The Author

“प्रस्तुत पुस्तक एक कालखण्ड के प्रमुख नाटकों में निहित रंग प्रस्तुति की रंग-मचीय संभावनाओं, बहुआयामी बिन्दुओं की ओर इंगित करेगा। एतत् कालखण्ड में अनेक नाटक लिखे गये परंतु यहाँ सभी नाटकों का विवेचन संभव नहीं हो सकेगा। यहाँ उन्हीं नाटकों को विवेचित किया गया है जो बहुचर्चित एवं बहुमंचित रहे हैं। एक-एक नाटक के समस्त रंगमंचीय तत्वों को समग्र रूप में विवेचित किया गया है।

आशा है यह पुस्तक शोधार्थियों एवं आलोचकों के लिए अपयोगी सिद्ध होगी, ऐसी मंगल कामनाओं सहित

डॉ. बृज मोहन ‘बड़थ्वाल'”

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