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हिंदी कविता केदारनाथ सिंह

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Author Name –  Pragnya Trivedi Shukla
केदारनाथ उन कालजयी कवियों में हैं जो अपने काव्य के माध्यम से संस्कृति का उन्नयन, भाषा की यथार्थ नई भंगिमा, लोक-जीवन एवं लोक-गीतों का समाहार, अभिजात्य एवं लघुजीवन के यथार्थ तथा काव्य में नवजीवन का संचार करते हैं।

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हिन्दी कविता - केदारनाथ सिंह: Hindi Kavita Kedaranath Singh

Description

“केदारनाथ उन कालजयी कवियों में हैं जो अपने काव्य के माध्यम से संस्कृति का उन्नयन, भाषा की यथार्थ नई भंगिमा, लोक-जीवन एवं लोक-गीतों का समाहार, अभिजात्य एवं लघुजीवन के यथार्थ तथा काव्य में नवजीवन का संचार करते हैं। जिनके विषय में अनेक समर्थ, अनुभवी और योग्य लोगों के द्वारा इतना कुछ लिखा गया है कि मेरे जैसे एक आम पाठक के लिए उन पर कुछ भी लिखना कागज काला करने जैसा ही होगा। किसी भी महान और स्थापित कवि

के विषय में लिखना बेहद मुश्किल कार्य है। कविता की रूह की गहराइयों में बसे कवि के बारे में लिखना उतना ही मुश्किल है जितना माँ का बच्चे के प्रति प्रेम को अभिव्यक्त करना क्योंकि मॉ अपने ही रक्त-मॉस से अपने बच्चे का निर्माण करती है। और एक कवि भी अपने भावबोध, संवेदना एवं अनुभव से गुजरते हुए निर्मित करता है शिशुरूपी कविता। उसके संवेगों की वाहक होती है उसकी कविता। काव्य की दृष्टि से इनका व्यक्तित्व न केवल आधुनिक कवियों में अपितु उत्तर आधुनिक हिंदी साहित्य में बेजोड़ है। वह एक उच्चकोटि के अध्यापक, वक्ता, मानवतावाद एवं समत्व भावना के प्रचारक श्रेष्ठ कवि के रूप में याद किये जाते हैं। शायद यही कारण है कि उनकी कविताओं में मौजूद अनुगूँज हमें बार-बार अपनी कविताओं की ओर खींचती है। एक कवि अपनी रचना लिखता है और समय के साथ आगे बढ़ जाता है लेकिन रचनाएँ उसे पुनर्जीवन प्रदान करती हैं। उनके नए पाठ होते हैं, पाठक नवीन दृष्टिकोण से काव्य की विवेचना अपने समय के संदर्भों से करता है। रचनाकार ने रचना लिखकर जिस वक्त पाठक के समक्ष प्रेषित की, बस उसी क्षण रचना पाठक की हो गई।”

About The Author

अब रचनाकार का उससे कोई हस्तक्षेप बाकी नहीं बचता है। इनकी कविताओं से गुजरते हुए कई बार असाध्य वीणा का केशकंबली प्रियंवद याद आया। असाध्य वीणा को बजाने का प्रयत्न जानें-माने कलावंत करते हैं पर वह बजती नहीं किसी से। बजती है तो सिर्फ केशकंबली प्रियवंद से। केशकंबली प्रियंवद वीणा को साधने से पूर्व स्वयं को साधता है। आधुनिक काल में कवितायें तो बृहद स्तर पर लिखी गई। पर कविता में केदारनाथ सिंह के समकक्ष शायद ही कोई कवि पहुँच पाया हो। हो सकता है कि यह मेरा बड़बोलापन हो फिर भी इन्होंने अपनी कविताओं से भावनाओं और अनुभूतियों को जो रंग और रूप दिया, उसके बारे में भाषा में कुछ भी कहना-लिखना सूर्य को दिया दिखाने के बराबर है। सुधीजन पाठक ध्यान दें केदारनाथ सिंह कविताओं में स्वयं को साधते रहे, एकदम कलावंत की तरह। सत्य, निष्ठा, प्रकृति, लोक-जीवन और भाषा पर अगाध विश्वास करने वालों के लिए ही है इनकी कविता। जावेद अख़्तर उनकी कविताओं के विषय में जब कहते हैं: ‘केदारनाथ सिंह भाषा के उस छूट गये’ लहजे’ को पकड़ते हैं, जो मनुष्य के विस्थापन की पीड़ा से जुड़ा है। ‘सन् 47 को याद करते हुए’ में ‘ अखीर’ ऐसा ही लहजा है, जिसका संबंध बोले जाने से है, लिखे या लिखे को आँखों से पढ़े जाने से नहीं। कभी-कभी इसकी जड़ भाषा के जन्म के पहले की कहानी में दिखती है, क्योंकि इसकी सारी क्रियाएँ और संज्ञाएँ खेतों और पगडंडियों, बिजली-चिरई-चुरूंग और सातों समुद्रों से निकली हैं।’ वह क्या है जो केदारनाथ सिंह की कविताओं को विशिष्ट बनाता है? जॉति-पॉति और धर्म की धज्जियाँ उड़ार्ती इनकी कविता आध्यात्मिकता और ऐहिकता के किनारों के बीच बहती एक नदी है। नदी भले ही भूतल पर प्रभावित एक जलधारा है पर जिसका श्रोत प्रायः कोई झील, हिमनद, झरना या बारिश का पानी होता है।

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