इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कीर्तिस्तंभ (यशस्वी अध्यापकों की शैक्षिक यात्रा) - ilaahaabaad vishvavidyaalay ke keertistambh yashasvee adhyaapakon kee shaikshik yaatra
Description
मार्च 2020 में जब कोविड महामारी के कारण “लॉकडाऊन” लगा तभी अपनी विदुषी धर्मपत्नी हेमलता जी से विचार विमर्श के उपरांत हमने यह निर्णय लिया कि इस समय का सदुपयोग अपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर कुछ लिखकर किया जाए। बचपन से ही हम इस विश्वविद्यालय की महानता की कहानियाँ सुनते आए थे जिसमें यह भी था कि देश का चौथा सबसे पुराना विश्वविद्यालय “ऑक्सफोर्ड ऑफ ईस्ट” के रूप में विख्यात था और बाद में इसे “आ.ए.एस. फैक्ट्री” भी कहा गया। यह एक सर्वमान्य धारणा है कि कोई भी संस्था अपने अध्यापकों के कारण ही अच्छी या बुरी होती है। हमने कहीं पढ़ा था कि अपने अतीत को जाने बिना भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता। यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि अध्यापकों के अकादमिक योगदान तथा उनके द्वारा शिक्षित छात्रों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किए गए योगदान ही संस्था की ख्याति को बुलंदियों तक पहुँचाने का काम करते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में विश्वविद्यालय के दिग्गज शिक्षकों की जीवनी नहीं लिखेंगे और पूरा फोकस उनके अकादमिक योगदान की उत्कृष्टता को उजागर करने पर ही होगा। इस सीरीज में 1872 से 2005 के बीच के अवकाश प्राप्त अध्यापक सम्मिलित हैं। प्रारंभ से ही मेरी बेमिसाल जीवन साथी हेम जी का सक्रिय सहयोग मुझे मिला, दरअसल लिखने के पश्चात वे बड़ी तन्मयता से हर आलेख की एडिटिंग करती थीं। सामग्री ढूंढने में सहायता करने के साथ ही फोटो एडिटिंग भी हेम जी बखूबी किया करती थीं। दुर्भाग्य से 13 अप्रैल 2021 को हेम जी हम सबको छोड़ कर अंनत की यात्रा पर चली गयीं। मुझे लगा कि अब मेरे लिए आगे लिख पाना संभव नहीं होगा लेकिन हेम जी ने ही मुझे प्रेरणा ही नहीं शक्ति भी दी और मैंने लिखना जारी रखा। इन दिग्गज मनीषियों पर हमारी रिसर्च का आधार सम्बन्धित विभागों में उपलब्ध दस्तावेजों, विभागीय शिक्षकों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी, सम्बन्धित शिक्षकों के परिजनों तथा उनके छात्रों द्वारा दी गई सूचनाओं तथा इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी है। हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारे जैसे विज्ञान तथा समाज शास्त्र के छात्र एवं
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स्व.प्रो. हेमलता श्रीवास्तव
हेम जी का जन्म 2 अक्तूबर 1951 में मद्रास में हुआ था। जीवाजी विश्वविद्यालय से उन्होंने B.A. तथा M.A. को डिग्री प्राप्त की। उन्होंने कत्थक नृत्य में “” नृत्य ज्ञानी”” की उपाधि अर्जित की।
वाद-विवाद, आशु भाषण, काव्य पाठ, निबंध लेखन आदि में उन्हें महारत हासिल थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के “”संपूर्ण क्रांति”” आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की।
“”आपातकाल”” में उनपर “”मोसा कानून”” के अंतर्गत वारंट जारी हो गया। भूमिगत रहते हुए वे सुल्तानपुर पहुंची और 1976 में कमला नेहरू संस्थान में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुयीं। यहीं फरवरी 1977 में उनका विवाह डाक्टर अरुण कुमार श्रीवास्तव से हुआ।
1981 में हेमलता जी सी.एम.पी. महाविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हुयीं। 1997 में वे एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर प्रोन्नत हुयीं। विभागाध्यक्ष के रूप में कई वर्षों तक उन्होंने अपनी अद्भुत प्रशासनिक क्षमता का परिचय दिया तथा छात्रा शाखा की निदेशक के रूप में छात्राओं को उच्च कोटि को शिक्षा दिलाने तथा उनके व्यक्तित्व के चतुर्मुखी विकास के लिये अथक प्रयास किये। वे महाविद्यालय के शिक्षक संघ की एकमात्र महिला अध्यक्ष चुनी गयीं। वे कवितायें एवं पैरोडी लिखती थीं तथा रंगमंच की जानी मानी कलाकार थीं। समाजशास्त्र पर B.A. के छात्रों के लिए उनकी पांच पुस्तकें प्रकाशित हुयीं जो बेहद लोकप्रिय हुयीं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विधि विभाग, समाजशास्त्र विभाग तथा मीडिया स्टडी केंद्र में भी उन्होंने अध्यापन किया। 2017 में रिटायरमेंट के पश्चात उन्होंने Shambhunath Institute of Law में अध्यापन किया। 13 अप्रैल 2021 को उनका निधन हो गया।
प्रो. अरुण कुमार श्रीवास्तव
27 जून 1950 को रायबरेली में जन्मे अरुण कुमार ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। 1974 में वे के. एन. आई. सुल्तानपुर में तथा 1979 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त हुये तथा धीरे-धीरे रोडर एवं प्रोफेसर बने। उन्होंने विभाग के अध्यक्ष तथा विज्ञान संकाय के डीन के दायित्वों का निर्वहन भी किया। 1984 में उन्हें “”यूनेस्को फेलोशिप”” मिली जिसके अंतर्गत उन्होंने Tokyo Institute of Technology में एक वर्ष तक उच्चस्तरीय शोध किया एवं “”International Post Graduate Course in Chemistry”” पूरा किया। 1991 में JITA ने उन्हें Tsukuba स्थित “”National Chemical Laboratory”” में शोध करने के लिए फेलोशिप प्रदान की। 2012 में “”इंडियन केमिकल सोसायटी”” ने उन्हें “”Prof.S.C.Ameta Medal”” देकर सम्मानित किया। 2015 में North Bengal University ने उन्हें “”D.Sc.”” की मानद उपाधि से सम्मानित किया। उनके निर्देशन में 30 छात्रों ने “”डी. फिल.”” तथा एक छात्र ने “”डी.एस-सी”” प्राप्त की। विश्व की जानी-मानी शोधपत्रिकाओं में उनके लगभग 125 शोधपत्र प्रकाशित हुये।






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