कामायनी एक अनुशीलन- Kamayani ek Anusheelan
Description
“की है. जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी बीवी शताब्दी सर्वश्रेष्ठ ष्ठ कालजय जिसमें त रहस्य का वादी जयी कृति है। यह एक ऐसा तत्कालीन महाकाव्य युग ध्वनित होता है। छायावाद युगान से पूर्ण यह यह कृति दर्शन से धित्व प्रतिनिधि महाकाव्य गूढ़ एव प्रकाशित शत हुए आधुनिक हिंदी साहित्य कर रही है। दरअसल कामायनी व गहन अध्ययन का विषय है। इस चौरासी इसके रहस्यम मयी गूढ़ वर्ष हो गए हैं। फिर भी अभी तक ग्रंथियों को सुलझाने में समीक्षकों एवं शोधकर्ताओं का प्रयास अपर्याप्त रहा है।
‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’ में आचार्य नगेन्द्र का प्रश्न है कि “”अभी तक कामायनी की कथा को एक निर्भात रूप-रेखा नहीं बन पाई। अतः कामायनी की एक आवश्यकता उसकी कथा की रूप-रेखा का स्पष्टीकरण भी है।”” “”कामायनी एक अनुशीलन”” इस प्रश्न का सार्थक उत्तर है। इसमें पूर्व की समीक्षा-कृतियों के अभावों को देखते हुए “”ऐसे हंथे हुए ठहराव से आगे जाँच-पड़ताल”” करके कामायनी के मननशील विद्वान रमेश कुंतल मेघ की ‘खोज-यात्रा’ में ‘निजी निमंत्रण’ को सहर्ष स्वीकार करते हुए इस ग्रंथ में कामायनी के आवरण-पटल की गूढ़ ग्रंथियों का सहजता के साथ व्यक्त करने का सार्थक प्रयास किया गया है।
अतः “”कामायनी : एक अनुशीलन”” कामायनी के विशिष्ट मूल्यांकन के क्रम में डॉ. अमल सिंह ‘भिक्षुक’ का एक अन्यतम आलोचना ग्रंथ है, जो अपने क्षेत्र में ज्ञान क्षितिज का विस्तार करता है। यह अपनी प्रस्तुति एवं प्रतिपादन की दृष्टि से सम्पूर्णता में नवीनता और मौलिकता का उद्घोष है। कुल मिलाकर मौलिकता, नवीनता एवं विशिष्टता का नियोजन-संयोजन – इस आलोचना-ग्रंथ का वैशिष्ट्य है। इसकी भाषा-शैली विशिष्ट, प्रांजल एवं स्तरीय है। भाषा गंभीर तथा विषयोद्घाटक है। अपने विषय को विवेचित-विश्लेषित करने में आलोचक सक्षम है। इस महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी आलोचना की पुस्तक को जरूर पढ़ना चाहिए।”
About The Author
कामायनी : एक अनुशीलन”” ग्रंथ डॉ. अमलसिंह ‘भिक्षुक’ द्वारा रचित है. जो काफी महत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी है। इनके पास आलोचना की तत्त्वान्वेषी दृष्टि है। यही वजह है कि इसमें मौलिक स्थापनाएँ हैं। इस ग्रंथ के आरंभ में छायावाद की पृष्ठभूमि और रहस्यवाद के साथ ही कामायनी में रहस्यवाद और आनंदवाद का विस्तृत एवं व्यापक आकलन है। डॉ. शम्भुनाथ सिंह ने छायावाद की पृष्ठभूमि पर विस्तार से काम किया है। अतः इस अध्याय को कम विस्तार देना चाहिए था। फिर, ‘कामायनी’ के कथा-सूत्रों पर विचार हुआ है। यह अध्याय मौलिक है। इससे ग्रंथकर्ता के अध्ययन क्षेत्र की जानकारी मिल जाती है। इस विषय में स्व. केसरी कुमार के निर्देशन में एक प्रशंसनीय कार्य हुआ था। उससे मदद लेनी चाहिए थी। बावजूद यह अध्याय बहुत ही अच्छा है। तदनंतर, ‘कामायनी’ के सर्ग-विभाजन तथा उसकी मनोवैज्ञानिक व्याख्या का प्रयत्न है। हिंदी आलोचना में इस पर गहरा विवाद है। फिर भी, भिक्षुक जी ने निष्कर्ष निकालने का सराहनीय प्रयास किया है। तदुपरांत, कामायनी के दार्शनिक पक्ष का उद्घाटन है। यह महत्त्वपूर्ण अध्याय है। इस पर भी विवाद है। डॉ. अमलसिंह ने विवाद निराकरण की भरपूर चेष्टा नये ढंग से की है। इसके बाद ‘त्रिपुर’ की व्याख्या है। यह अध्याय काफी महत्त्वपूर्ण है तथा विश्लेषण में तथ्य एवं तर्क का तीखापन है। प्रयास अत्यंत ही सराहनीय है। बावजूद इसके, कामायनी के तांत्रिक तथा योगधर्मिता का विश्लेषण है, जिसमें मौलिक स्थापनाएँ हैं। अंत में गंभीर सारगर्भित उपसंहार है।
कुल मिलाकर यह एक बहुत ही अच्छा आलोचना-ग्रंथ है। आलोचक ने तथ्य कथन में सराहनीय प्रयास किया है। तथ्यों का विश्लेषण मौलिक है। इनके पास आलोचना की शक्ति है, तभी तो वह गहराई से जाँच कर पाते हैं। इनकी भाषा में प्रवाह तथा विश्लेषण की क्षमता है। भाषा विषयानुकूल, प्रांजल और समृद्ध है। इस महत्त्वपूर्ण मौलिक कार्य के लिए डॉ. अमल सिंह ‘भिक्षुक’ बधाई के पात्र हैं। शुभ कामनाएँ।
डॉ. रामविनोद सिंह






Reviews
There are no reviews yet.