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कोरोना त्रासदी और प्रेम-पत्र

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Author Name – ज्ञानेश ‘सीतांशु’
मेरी माँ के पास कहानियों की पोटली थी जिसमें तरह-तरह की कहानियाँ कैद थीं। हम अपनी ज़िद से उन कहानियों को माँ से सुनकर एक नई दुनियाँ में चले जाते थे। मेरी माँ ने मेरे अन्दर कहानी पढ़ने और लिखने का बीज बोया था”” यह ज्ञानेश ‘सितांशु’ के कहानी संग्रह की भूमिका के आरंभ का ही एक हिस्सा है।

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कोरोना त्रासदी और प्रेम-पत्र

Description

मेरी माँ के पास कहानियों की पोटली थी जिसमें तरह-तरह की कहानियाँ कैद थीं। हम अपनी ज़िद से उन कहानियों को माँ से सुनकर एक नई दुनियाँ में चले जाते थे। मेरी माँ ने मेरे अन्दर कहानी पढ़ने और लिखने का बीज बोया था”” यह ज्ञानेश ‘सितांशु’ के कहानी संग्रह की भूमिका के आरंभ का ही एक हिस्सा है। सोचिए जिसके अन्दर कहानी के बीज उसकी माँ ने बोए हों, उसकी कहानी का भाव कितना सुन्दर होगा। भाषा में कितना संस्कार होगा। वह भूमिका में ही आगे लिखते हैं-“”आज बेशक आधुनिकता ने हमें असंवेदनशील बना दिया है लेकिन हमारी सद्भावना की परम्परा ने हमें एक दूसरे से जोड़े रखा। कोरोना के कठिन समय में जहाँ लोग अमानवीय व्यापार और व्यवहार कर रहे थे वहीं कुछ लोग अपनी जान पर खेलकर एक दूसरे की मदद कर रहे थे। मुझे कहानियों की भावभूमि यहीं से मिलती है। मेरी एक कहानी कोरोना की त्रासदी पर ही केन्द्रित है। मैं साहित्य को सकारात्मक भावों की अभिव्यक्ति मानता हूँ। इसलिए मेरी कहानियाँ भी अंततः सुखद होती हैं। मैं हमेशा यह मानता रहा हूँ कि जो साहित्य संबल न दे सके वह किस काम का? साहित्य अपनी संवेदना से बंजर में जीवन उत्पन्न कर सकता है।”” जिस कहानीकार के अन्दर समाज के लिए ऐसी भावना होगी उसे निश्चित ही पढ़ना चाहिए बल्कि दूसरों को पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

युवा पीढ़ी का लेखन मुझे आकर्षित करता है। मेरे पास प्रतिमाह दो दर्जन से अधिक किताबें आती हैं। सबसे पहले मैं युवाओं का साहित्य पढ़ती हूँ। दरअसल युवाओं के लेखन से ही हम समझ पाते हैं कि, समाज में किस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं। भाषा और शिल्प की बनावट में

About The Author

“कवि, कहानीकार ज्ञानेश ‘सीतांशु’ का जन्म वैशाली जनपद (बिहार) के एक छोटे शहर लाल गंज के पटवाटोली में हुआ। पिता श्री अविनाश नाथ मिश्र टाइपिंग इंस्टीट्यूट चलाते थे तथा माँ माया मिश्र धार्मिक विचारों की गृहणी हैं। अपने दादा श्री सूर्यनाथ मिश्र के प्रति विशेष आस्था रखने वाले ज्ञानेश ने उन्हें कभी देखा नहीं लेकिन उनका मानना है कि उनके अंदर साहित्य का संस्कार उन्हीं से प्रस्फुटित हुआ। सूर्यनाथ मिश्र जी पटना विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट आयुर्वेदिक चिकित्सक और बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य पर उनका विशेष अधिकार था। वह स्वयं कुशल नाटककार, मंझे हुए गायक और वादक थे।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से BCA+MCA की शिक्षा ले चुके ज्ञानेश पिछले डेढ़ दशक से कम्प्यूटर के अध्यापक हैं लेकिन हिंदी और संस्कृत साहित्य में विशेष रूचि है। इग्नू, बिहार यूनिवर्सिटी, नवोदय विद्यालय आदि में रिसोर्स पर्सन के रूप में दस वर्षों तक अध्यापन का अनुभव।

सम्प्रत्ति : शिक्षा निदेशालय, दिल्ली में अध्यापक।”

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