मध्यकालीन हिन्दी नीति काव्य में मानव मूल - Madhyakaaleen Hindee Neeti Kaavy Mein Maanav Mool
Description
मध्यकालीन नीतिकाव्य भारतीय साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह काव्य अपने परिवेश के प्रति सचेत प्रतिबद्ध एवं युगांतरकारी काव्य है। जिसने अपनी लोकवादी सांस्कृतिक चेतना के द्वारा समाज में ज्ञान की अलख जगाने का प्रयास किया है। इस काव्य में जिन सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक जीवन मूल्यों को अभिव्यक्ति मिली है वह अपने जीवंतता एवं समरसता के कारण आज भी अनुकरणीय बने हुए हैं। ये मूल्य समाज की वह रीड़ है जिसके सहारे समाज अस्तित्ववान होता है। आधुनिक समाज में जहाँ चारों ओर संकीर्णता, स्वार्थपरता, बेईमानी, भ्रष्टाचार और अवसरवादिता का बोलबाला है, वहां उदात्त मूल्य के बिना भविष्य की ओर जाना, मानव जाति के लिए हानिकारक है। ऐसे में प्रस्तुत पुस्तक ‘मध्यकालीन नीति काव्य में मानव मूल्य’, मध्यकालीन नीति काव्य में अभिव्यक्त उन मानव मूल्यों को हमारे सामने रखती है, जिनकी आज के युग में नितांत आवश्यकता है। इस युग के पन्नों से उद्धृत इन मूल्यों को अपने जीवन में उतारकर हम आज अपने वर्तमान युग को उत्कृष्ट बना सकते हैं। हमें केवल इन मध्यकालीन कवियों और भक्तों द्वारा अभिव्यक्त सार्वभौमिक मानव मूल्यों को फिर से अपने अक्स में उतरने की आवश्यकता है।
About The Author
डॉ. ममता चावला
शिक्षा: बी.ए., एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी. दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली। भारतीय अनुवाद परिषद से वाक् सेतु (अग्रेजी-हिंदी) अनुवाद में स्नातकोत्तर डिप्लोमा ।
अध्यापन अनुभव : 18 वर्ष
प्रकाशित शोध लेख :
तत्सम- जिजीविषा की विजय गाथा
राग दरबारी : यथार्थ और लोक जीवन की व्यंग्यात्मक गाथा
भूमंडलीकरण एवं हिंदी भाषा
स्त्री विमर्श के परिदृश्य में ध्रुवस्वामिनी
बकरी नाटक में विद्रोह एवं क्रांति का स्वर
आपका बंटी : बिलखते बचपन की अनसुनी कहानी
सामाजिक सरोकारों के कवि रहीम मानव मूल्य और उसके विविध आयाम
भारत- भारती : स्वर्णिम अतीत से भविष्य तक का सफर
भाषा के सामाजिक संदर्भ
स्वतंत्रता संग्राम और नारी शक्ति
संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग माता सुंदरी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय”






Reviews
There are no reviews yet.