महराब और अन्य कहानियाँ
Description
“भगवानदास मोरवाल सिर्फ कहानियाँ लिखने के लिए कहानियाँ नहीं लिखते हैं, बल्कि अरसे तक मन-ही-मन किसी चिंता या समस्या से जूझते हुए अपने सामने उपस्थित यथार्थ या ऊपर-नीचे, आगे-पीछे, अंदर-बाहर प्रायः हर तरह से आकलन करते हुए घटनाओं और पात्रों को सुनिश्चित करते हैं। पहली नज़र में लगता है मोरवाल किसी समस्या को डील करने के मकसद से उसका कथात्मक निरूपण और आख्या कर रहे हैं। हालाँकि यहाँ किसी तरह की कोई साँचाबद्धता या वैचारिक यांत्रिकता नहीं पाई जाती है। बल्कि कहना होगा कि साँचाबद्धता और वैचारिक यांत्रिकता से मोरवाल का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं।
मोरवाल की सफलता और सृजनात्मकता इसी बात में है कि वैचारिकता या कहें कि विमर्शमूलकता घटनाओं और पात्रों के आपसी तनाव और संघर्ष से स्वतः यहाँ फूटती और पूरी कहानी को आलोकित करती नज़र आती है।
-डॉ. शंभु गुप्त
वरिष्ठ आलोचक
परिकथा (द्विमासिक)
जनवरी-फरवरी 2009″
About The Author
“भगवानदास मोरवाल की कहानियों में स्पष्ट पक्षधरता है उन तमाम वर्गों के हक में जो सदियों से दमित, दलित और वंचित रहे हैं। वे अपने इस आशय को किन्हीं वैचारिक आवेगों के कारण नहीं, बल्कि ज़िन्दगी की तल्ख हकीकतों से पाया हुआ ऐसा मानते हैं जो एक संवेदनशील साहित्यकार को गहराई से आंदोलित करता है। अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था और उतने ही क्रूर धर्म-विधान के चलते पीड़ित समाज की कराह की जीवंत अभिव्यक्ति को अपने रचना-कर्म में महत्त्वपूर्ण रूप से लेखन करना इनके लिए बुनियादी साहित्यिक सरोकार है।
– मुकेश वर्मा
वरिष्ठ कथाकार
इनके पात्रों की विशेषता यह है कि वे एकरेखीय नहीं हैं और मोरवाल ने भी उन्हें किसी सपाट खाँचों में ढालने की ज़िद नहीं की। दूसरी बात यह है कि इन कहानियों में मुस्लिम और निम्न वर्ग जीवन के जैसे सजीव चित्र आए हैं, वे मानो दुर्लभ होते जा रहे हैं। मोरवाल विमर्शवादी लेखन के पक्षधर नहीं है और उनका भरोसा व्यापकता में है।
– पल्लव
जनसत्ता; 12 अक्टूबर, 2008
स्थानीयता, लोकाचार, पराये से लगते रीति-रिवाज़, बंधनहीन धर्म और एक विशिष्ट ग्रामीण जीवन-परंपरा को भगवानदास मोरवाल ने अपनी कहानियों में इस तरह उठाया है कि कहानी जैसी साहित्यिक रचना के आवश्यक अंग बन गए हैं और यही कहानी में एक ताज़गी दिखाई देती है।”






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