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मिथिलेश्वर का कथा साहित्य एक विष्लेषण

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Author Name – Dr. madhu trivedee
मिथिलेश्वर जी का अनुभव-संसार इतना विस्तृत है कि उसके अंदर मानव जीवन का प्रत्येक पक्ष सिमट कर आ गया है।

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मिथिलेश्वर का कथा साहित्य एक विष्लेषण - Mithileshvar KA KATHA saahityah ek vishleshan

Description

मिथिलेश्वर जी का अनुभव-संसार इतना विस्तृत है कि उसके अंदर मानव जीवन का प्रत्येक पक्ष सिमट कर आ गया है। मानव जीवन के प्रति उनका अपना एक अलग उद्देश्य है। मानवता के पक्के हिमायती होते हुए भी उन्होंने अपने उपन्यासों में मानव की स्वाभाविक दुर्बलताओं को परत-दर-परत खोलकर रख दिया है। परंतु इतना अवश्य है कि वे मानवता की विजय की कामना करने वाले शुभचिंतकों में एक हैं। उन्होंने किसी वाद-विवाद के झमेले में न पड़कर, अपने लिए एक समन्वय का नजरिया अपना लिया है। उनका यह दृढ़ विश्वास है कि बिना यथार्थ की दृढ़ भूमि का सहारा लिए यथार्थ चिंतन का भव्य भवन निर्मित ही नहीं हो सकता। समय एवं परिवेशजन्य परिस्थितियों ने मिथिलेश्वर जी को रचना के लिए प्रेरित किया है। देश के अंदर बढ़ती हुई सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषमताओं की मार को मिथिलेश्वर जी का कोमल एवं मार्मिक हृदय सह नहीं पाया और उनकी व्याकुल आत्मा की पुकार मानवीय संवेदना के स्वरों में गूंज उठी जिसका परिणाम उनकी कृति में प्रस्तुत है।

About The Author

मौजूदा हालातों से समाज को बाहर निकालना उन्होंने अपना पवित्र कर्त्तव्य समझा है। मिथिलेश्वर जी की विशेषता इस बात में भी है कि यथार्थवाद की अपनी कला के अन्तर्गत जो भी प्रसंग, घटनाएँ, स्थितियाँ या पात्रों द्वारा किये गए कार्य कथा साहित्य में हैं वे सभी प्रादेशिक ही हैं, जो प्रतिनिधित्व करते हैं। अभिव्यक्ति का स्वरूप सम्पूर्ण भारत का वास्तविकता की इनकी रचनाओं में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं के अनसुलझे पहलुओं के द्वारा जीवन के मर्मस्पर्शी एवं हृदयविदारक यथार्थ को उजागर करने में सक्षम है।

समकालीन साहित्यकारों में मिथिलेश्वर अपनी एक विशिष्ट पहचान बना चुके हैं।

इनकी रचनाओं में शहरी तथा ग्रामीण दोनों ही स्थितियों का यथार्थ चित्रण हुआ है। फिर भी ग्रामीण-जीवन के यथार्थ चित्रण से कथाकार का विशेष लगाव दिखाई पड़ता है। इनके कथा साहित्य में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक यथार्थ चेतना का हुबहु चित्रण हुआ है। मिथिलेश्वर का ध्यान सामाजिक धरातल पर टिका हुआ है। इनका हृदय समाज में व्याप्त कोलाहल से व्याकुल दिखाई पड़ता है।

अब तक की जीवन-यात्रा में इन्होंने ग्रामीण तथा शहरी समाज के अनेक यथार्थ अनुभवों को जाना और भोगा है।

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