मोहन लाल महतो वियोगी: जीवन और साहित्य - Mohan Lal Mahto Viyogi : Jivan aur Sahitya
Description
हम निरंतर साहित्य और कला की अभेद्य दुनिया में निशंक प्रवेश करते जा रहे हैं। तीव्रता तीक्ष्ण ढलान-सी है, किंतु यह सात्यलोक की ओर बढ़ने का समय है। धुंध के उसपार पहुँचने का समय है। ऐसे ही समय की सन्धि रेखा पर खड़ी जिस रचनाकार का नाम स्मृति पर कौंधता है वह कादम्बिनी हैं। अपने नाम के अनुकूल बल्कि यह कहें कि अरपा ने जिनके मनोभाव और भाषा को सिंचित किया हो, उनकी सृजनशीतला कितनी मार्मिक और मानवीय होगी, यह उनकी रचना, और उनके सान्निध्य में रहकर ही जाना जा सकता है। विगत कई वर्षों में मैंने उन्हें साहित्य और समव की गहरी चिंता और चिंतन करते हुए पाया है। किंतु उनके चिंतन और सृजन का केंद्र मुक्ति हो रहा है।
कोई संत या सहृदय मीमांसक ही इससे मुक्ति दिला सकता है, कला का रहस्य उसकी स्वतंत्रता में ही छिपा होता है और इसकी अभिव्यक्ति रूप में और यही वह अकेली सम्भावना है जो कलाकार को अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रतिवद्ध बनाती है। स्वतंत्रता के इस आकारहीन हलके में ऐसी सम्भावना न तो आकस्मिक है और न मनमानी। आत्मप्रकाशन के कारण कृति में रचनात्मक व्यक्तित्व पाठक के मन में स्वतः ही दैदीप्यमान होता रहता है। कृति में रचनात्मक व्यक्तित्व जितना विराट होगा रचना उतनी महान व प्रभावशाली होगी किन्तु सृजन प्रक्रिया में रचनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण उदार सामाजिकताएं, जनसत्तात्मकताएं, वैयक्तिक स्वतंत्रताएं, परम्परा, ज्ञान, मूल्यवोध के कारण संभव है। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति कृति पर अवांछित प्रभाव उत्पन्न करेंगी। इससे रचना और पाठक के मघय तनाव होगा एवं कृतिकार का रचनात्मक-व्यक्तित्व पाठक के मन में अपूर्ण और क्षयी होगा। पाठक को पूर्ण होने के लिए रचना से एकात्म भाव होना आवश्यक है। कादम्बिनी रचना और पाठ के अंतःसंबंध में पाठ की अनिवार्यता पर बल देती हैं।
About The Author
उनके लिए अर्थ पाठक को संकुचित और तंतुहीन सीमा से उठाकर मानवीय और नैसर्गिक प्रभामंडल में स्थापित करने की क्रिया है।
मोहन लाल महतो के रचनाकर्म को कादम्बिनी ने समकाल की चिंता के बरक्स देखा है। इसके लिए उन्होंने जिन तथ्यों और सामग्रियों का चयन किया है, मूलतः वे प्राथमिक हैं। रचना को समझने का प्रतिफलन उसकी रचना प्रक्रिया और वैचारिक आयाम में निहित है। हालाकि उसको प्रायोगिकता नये-नये मत मत्तान्तारों अथवा विमर्श को गढने में परिलक्षित होती है। इतना ही नहीं, साहित्य में ये नये-नये प्रयोग उसकी समुचित विकास परम्परा को इंगित करने का भी काम करते हैं। कादम्बिनी ने श्रुति परम्परा की किस्सागोई, पौराणिक गाथाएं या आधुनिक समय में पश्चिम के अनेक काव्य-आंदोलनों के बरक्स वियोगी जी का मूल्यांकन किया है। छायावादी प्रतिमान से आगे निकलकर उन्होंने स्त्री समय और भाषा के बिलकुल नये टूल तैयार किए हैं। उन्होंने प्रकृति की रम्यता/सुन्दरता के साथ-साथ प्रकृति के गीत यथा-नदियों के कल कल की ध्वनि, चिडियों की चहचहाहट, या वन प्रान्त से दूर तक चलती हुई हवाओं के ध्वनियों का संगीत छोड़ा नहीं, बल्कि उसकी सहधर्मी बनी रहीं। उनकी आलोचना में प्रकृति से कटाव नहीं है, जुड़ाव है। इसीलिए वे अपने समकाल की अनूठी रचनाकार हैं।
– सुशील द्विवेदी






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