निरवधि भुवनेश्वर: भुवनेश्वर साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययन - NIRVADHI BHUVNESHWAR: Bhuvneshwar Sahitya Ka Alochnatmak Adhyayan
Description
“हिन्दी साहित्य जगत की भूली-बिसरी याद या विसराई गई यादों में, एक कभी न भुलाई जा सकने वाली याद है भुवनेश्वर प्रसाद और उनकी अमर रचनाएँ, जिनकी संभावित जन्म शताब्दी 2011-12 में मनाई गई। भुवनेश्वर हिन्दी के सबसे कम आंके और कम सराहे गए पथ-प्रणेता साहित्यकार हैं। हिन्दी के प्रथम एवसर्ड अथवा सर्रियलिस्ट नाटक, ‘तांबे के कीड़े’ तथा हिन्दी की प्रथम आधुनिक कहानी ‘भेड़िये’ के रचयिता की आज भी मुश्किल से आधी ही रचनाएं सामने आ पाई हैं। मुंशी प्रेमचन्द द्वारा संस्तुत एवं आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे शीर्ष इतिहासकार आलोचक द्वारा संज्ञान में लिए गए इस मेधावी रचनाकार की रचना-यात्रा ‘डार्कनेस एट नून’ बनकर क्यों रह गई? किस जड़ीभूत मानसिकता के कर्ता कारकों और उनकी प्रेरणार्थक क्रियाओं ने इनके कृतित्व को अपूर्णभूत बना दिया ?
भुवनेश्वर प्रसाद ने तीस के दशक की विहान बेला में, ठेठ छायावादी युग में घोर संशयवादी आधुनिक मुद्रा में प्रवेश किया। 1931 में, अर्थात् ‘ध्रुवस्वामिनी’ के प्रकाशन से दो वर्ष पूर्व आज के स्त्री विमर्श की तान छेड़ी। अपने नाट्य प्रयोग ‘एकाकी के भाव’ में अपने मननशील लेखन का खाता खोला ‘पुरूष, तू मेरा शत्रु नही, मैं तेरे विरूद्ध लड़ाई नहीं लड़ना चाहती। तूने सैंकड़ो वर्ष पूर्व अपने क्रूर स्वार्थ में अन्धे होकर मुझ पर अत्याचार किए हैं, पर तुझे मुझसे, मेरे उत्थान से भयभीत नहीं होना चाहिए।’
विचारक भुवनेश्वर :
‘आदमी है खतरनाक आदमी है सोचता'”
About The Author
“यों तो प्रत्येक रचनाकार सृजन के पथ पर संघर्ष करता है पर भुवनेश्वर का असाधारण योगदान इस तथ्य में निहित है कि मित्रों के रीझे या खीजे आश्रय में, पार्क की बेंचों पर, रेलगाड़ी के खाली डिब्बों में या फिर रेलवे स्टेशन पर बैठकर उन्होंने अखबारों की कतरनों पर युगांतरकारी रचनाओं की सृष्टि की। आज जिसे हम एंटी-साहित्य और थिएटर ऑव दी एबसर्ड कहते हैं उसके जनक भुवनेश्वर ही थे।
जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी मैली-कुचेली पतलून-कमीज या मांगे हुए फटे-पुराने चेस्टर या शेरवानी को ढोते हुए, बिजली के तारों की बेल्ट और जूते के फीते बनाकर या फिर केवल टाट लपेटे हुए, जूतों के स्थान पर पैरों में चिथड़े लपेटे हुए भटकते रहे। वर्षों से स्नान को तरसती उनकी देह किसी खाली रिक्शा, रेलवे स्टेशन की बेंच अथवा भिखारियों के टोले में शांत हो गई, अपना अशांत मन लिए हुए। हिंदी साहित्य का यह मास्टर मदन किसी बड़े खयाल का आधा आलाप लेकर ही कहीं बैरंग लावारिस लौट गया।
ब्लैक होल में बदलती विषाद की बुद्धिमत्ता”









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