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निशंक का रचना संसार देश के पार

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Author Name – Pro. Rama
निशंक का साहित्य प्रकृति और पहाड़ में व्याप्त पीड़ा और अनुराग दोनों का समन्वय है। उनके साहित्य में प्रेम है, देश है, करुणा है, मानवीय सरोकार है, जीवन का यथार्थ है और सबसे बड़ी बात कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्था है।

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निशंक की रचना संसार देश के पार (प्रवासी साहित्यकारों की नज़र में निशंक साहित्य भाग-2) - Nishank ka rachana sansaar desh ke Paar pravaasee saahityakaaron kee nazar mein nishank saahity bhaag-2

Description

पुस्तक परिचय

निशंक का साहित्य प्रकृति और पहाड़ में व्याप्त पीड़ा और अनुराग दोनों का समन्वय है। उनके साहित्य में प्रेम है, देश है, करुणा है, मानवीय सरोकार है, जीवन का यथार्थ है और सबसे बड़ी बात कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्था है। विश्वास है। उत्सवधर्मिता है। डॉ. रमेश पोखरियाल “”निशंक”” कवि, कथाकार, जीवनीकार, यात्रावृत्तांत कार, मोटिवेशनल गुरु और पत्रकार भी हैं। जैसे वह साहित्य में बहुआयामी हैं वैसे ही व्यक्तिगत जीवन में राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, हिंदी सेवी, सामाजिक कार्यकर्ता और ज्योतिष एवं दर्शन के चिंतक भी हैं। भारतीय संस्कृति में अगाध आस्था रखने वाले निशंक का संपूर्ण जीवन अनुकरणीय है।

वह जहां भी रहे, वहां अपनी वैचारिकी और कर्म से लोकप्रिय हुए। अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता के कारण सम्मानित पदों को सुशोभित करते रहे। साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा को उनके लेखन में महसूस किया जा सकता है। इस पुस्तक में भारत से बाहर रहकर भारतीय साहित्य, हिंदी भाषा और संस्कृति के प्रति समर्पित प्रवासी साहित्यकारों द्वारा निशंक जी की पुस्तकों पर लिखे गए लेख हैं। प्रवासी साहित्यकारों ने बड़े मनोयोग से उन पर लिखा है। यह पुस्तक निशंक जी के साहित्य पर शोध करने वाले शोधार्थियों और उनके साहित्य को समझने की इच्छा रहने वाले प्राध्यापकों और विद्यार्थियों के लिए निर्णायक होगी। लगभग बीस देशों के लेख इसमें शामिल हैं। इसमें शामिल लेख बताते हैं कि निशंक जी की लोकप्रियता देश से बाहर भी है।

About The Author

मैं निशंक बढ़ रहा मैं निशंक बढ़ रहा जाति-पांति को हटा भेदभाव को मिटा हृदय-हृदय के तल पहुंच विजय के गीत गा रहा मैं निशंक…

मैं लक्ष्यहीन हूं नहीं पथ कंटकों पर जा रहा जो भाग्य से मिला मुझे स्वदेश प्रेम पढ़ रहा… मैं निशंक…

तूफान गोद में बिठा अंधकार को मिटा सब बेड़ियों को तोड़कर स्नेह सूत्र जोड़कर कंटकों को मैं सहज प्रशस्त मार्ग कर रहा मैं निशंक…

दिशा दिशा प्रकाश कर लक्ष्य ओर बढ़ रहा आया जो सामने समझ गया, वह जड़ रहा

डॉ. रमेश पोखरियाल “निशंक”

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