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पाखंड के इस दौर में (व्यंग्य संग्रह)

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Author Name – डॉ. गंगाधर पटेल पुष्कर
पाखण्ड के इस दौर में एक समय था, जब ‘पाखण्ड’ शब्द का उपयोग धर्माचरण के स्वार्थपरक क्रिया-कलापों के लिए ही किया जाता था। लेकिन आधुनिक समाज में अब इस शब्द का विस्तार इतना व्यापक हो चुका है कि मनुष्य-समाज का कोई कार्य व्यवहार इससे अछूता और अप्रभावी नहीं रह गया है।

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पाखंड के इस दौर में (व्यंग्य संग्रह) - Paakhand ke is daur mein (Vyangy Sangrah)

Description

“पाखण्ड के इस दौर में एक समय था, जब ‘पाखण्ड’ शब्द का उपयोग धर्माचरण के स्वार्थपरक क्रिया-कलापों के लिए ही किया जाता था। लेकिन आधुनिक समाज में अब इस शब्द का विस्तार इतना व्यापक हो चुका है कि मनुष्य-समाज का कोई कार्य व्यवहार इससे अछूता और अप्रभावी नहीं रह गया है। धर्मसत्ता के आडंबर की सीमा को लांघकर इसके घातक विषाणु समाज के आर्थिक, राजनैतिक तंत्र को संक्रमित करते हुए हमारे लोक व्यवहार और हमारे दैनंदिनी आचरण मैं भी अपनी पैठ बना चुके हैं और हमारी ऐसी विवशता है कि हम पाखण्ड के इसी दौर में जीने को अभिशप्त हैं। यही हमारे समय का सत्य है और सत्य यह भी है कि हमारे उदात्त भारतीय समाज में जब भी सामाजिक और नैतिक विकृतियों ने अपना फन फैलाया है, तब-तब उसका पुरजोर मान-मर्दन भी हुआ है। बाबा गोरखनाथ और कबीर जैसे मनीषियों ने अपने कृतित्व से समय की मांग के अनुरूप वही कुछ किया जो तत्कालीन परिस्थितियों में उन्हें करना चाहिये था। आज की बात करें तो परसाई से लेकर रवीन्द्र नाथ त्यागी, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, लतीफ घोंधी, ज्ञान चतुर्वेदी जैसे व्यंग्य पुरोधाओं ने सामयिक विद्रूपताओं पर खासा प्रहार किया है, डॉ. गंगाधर पटेल ‘पुष्कर’ भी वही कर रहे हैं जो उनके अग्रणी व्यंग्य पुरोधाओं ने अपनी लेखनी के जरिये किया है।”

About The Author

“पाखण्ड के इस…

‘पाखण्ड के इस दौर में’ शीर्षक इस व्यंग्य संकलन के पहले डॉ. गंगाधर पटेल की पाँच व्यंग्य कृतियाँ प्रकाश में आ चुकी हैं, जिसमें उन्होंने समाज की आत्मा तक में समा चुकी गहन विद्रूपताओं की पड़ताल की है। इन पुस्तकों को पाठकों से भरपूर सराहना भी मिली है। इस व्यंग्य कृति में भी उन्होंने समाज में व्याप्त धार्मिक अंधविश्वास, सर्वहारा वर्ग का घोर शोषण, व्यभिचार, राजनैतिक अधोपतन, नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार सहित अनेकानेक विषयों पर करारा व्यंग्य किया है, जिसे पढक़र मन एक बारगी विक्षोभ और करुणा से भर आता है।

डॉ. पटेल एक मननशील लेखक और गंभीर पाठक भी हैं। वह खूब पढ़ते हैं और कम लिखते हैं। हरिशंकर परसाई उनके प्रिय व्यंग्यकार रहे हैं जिनके कृतित्व पर उन्होंने शोध कार्य भी किया है, इस नाते यह कहा जा सकता है कि व्यंग्य की उपादेयता को वह भली प्रकार समझते हैं। उन्होंने व्यंग्य लेखन की एक अनूठी पद्यात्मक शैली विकसित की है। वह दोहा शैली में भी व्यंग्य लिखते हैं उनकी यह विशेषता उनके समकालीन व्यंग्य लेखकों से उन्हें अलग और विशिष्ट बनाती है। संकलित व्यंग्य, कथ्य की दृष्टि से सर्वथा नवीन और सामायिक हैं। व्यंग्य की भाषा, आमफहम है और उसकी शैली तुकांत है, जिससे वह पाठकों पर अपना गहरा असर छोड़ती हैं।

यह व्यंग्य संग्रह अपने सृजन के उद्देश्य में सफल होकर साहित्य प्रेमियों के लिये पठनीय और उपयोगी साबित होगा ऐसा मेरा विश्वास है।”

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