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फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास

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Author Name – Raakesharenu Ambareen Aafataab
फणीश्वरनाथ रेणु के लेखन म लोक की, उनके जीवन और संस्कृति की तरह-तरह की रंग-विरंगी छवियों हैं।

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फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास - Phaneeshvaranaath renu ke upanyaas

Description

फणीश्वरनाथ रेणु के लेखन म लोक की, उनके जीवन और संस्कृति की तरह-तरह की रंग-विरंगी छवियों हैं। वह मानवीय संवेदनाओं के अतुल्य चित्रकार हैं लेकिन ये केवल मनोजगत के कथाकार नहीं, बल्कि बाह्य जगत की घटनाओं के, त्रासदियों और खुशियों के लेखक हैं जो मनुष्य के बाहरी-भीतरी दोनों भावलोकों को प्रभावित करती हैं। इस लोक जीवन का एक सांस्कृतिक पक्ष है तो दूसरा और भी महत्त्वपूर्ण पक्ष सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक है।

रेणु का संपूर्ण जीवन और लेखन अन्याय, असमानता, अत्याचार और तानाशाही के विरोध का, लोकतंत्र, आजादी और अधिकारों की बहाली का लेखन है। सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता के लिहाज़ से देखें तो उनका व्यक्तित्व गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन और रामवृक्ष बेनीपुरी सरीखा है। दूसरी ओर अपने कृतित्व में ये प्रेमचंद की परंपरा की अगली कड़ी हैं। प्रेमचंद ने सामंती व्यवस्था के नीचे दवे भारतीय गाँव के विखंडन को देखा और गहराई से महसूस किया। गोदान की ट्रेजडी उसी तकलीफदेह विखंडन की अभिव्यक्ति है।

फणीश्वरनाथ जी के उपन्यासों का आरंभ प्रायः उसी स्थान से होता है जहाँ प्रेमचंद की ग्राम कथा खत्म होती है। इसे वार-वार स्वीकार किया गया है कि ‘मैला आँचल’ हिंदी की अनूठी कृति है और उसके प्रभाववश, उस शिल्प और शैली में आगे अनेक उपन्यास लिखे गए किंतु उनम से किसी में भी वह अनूठापन नहीं है जो मैला आँचल की विशेषता है। रेणु ने अपने उपन्यासों में विखंडित गाँव और उसके जीवन के आंतरिक संगीत को पकड़ा है जो तमाम विषमताओं और विपरीत परिस्थितियों के वावजूद उन्हें जीने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। रेणु के उपन्यासों में टूटे हुए, हताश ग्रामीण लोगों के जीवन में रचे-बसे अक्षत-अप्रतिहत संगीत की धुन सुनाई देती है। उनकी यथार्थ चेतना का लोकभाषा और लोक संगीत से गहरा आत्मीय संबंध है जो उनके बाद के अथवा उनके समकालीन उपन्यासकारों में नहीं है। यह जीवन संगीत रेणु के लोक में बसे होने और उसकी आंतरिक धुन को पकड़ पाने और अभिव्यक्त कर पाने के कारण संभव हुआ है।”

About The Author

रेणु अपने उपन्यासों में सामाजिक विषमताओं पर चोट करते हुए सत्ता के षड्यंत्रों का तीव्र विरोध करते हैं। क्रातिधर्मिता, परिवेश से गहन संबद्धता और अपने जीवनानुभवों को युगीन स्पंदनों से संपृक्त कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का रेणु का कौशल उन्हें औपन्यासिक धरातल पर विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। राजनीतिक संवेदनहीनता के दौर में जन-प्रयासों के बीच मानवीय ऊष्मा की तलाश करते रेणु सहज रूप में देखे जा सकते हैं। वस्तुतः यह उनके उपन्यासों में सन्निहित यथार्थचेता पक्ष ही है जो एक उपन्यासकार के रूप में रेणु की विशिष्टता एवं महत्ता को रेखांकित करता है और जिसके प्रभावस्वरूप उनका परिवेश, समय व समाज, अपनी समूची विसंगतियों एवं अंतर्विरोधों के साथ रचनात्मक धरातल पर रूपायित हो उठता ।

कई बार लगता है कि मैला आँचल की छाया में रेणु के अन्य उपन्यास दब गए हैं। इन उपन्यासों की रचना के आधी सदी या उससे भी अधिक समय गुजर जाने के बाद हम देखते हैं कि कलेवर में छोटे इन उपन्यासों का महत्त्व गौण नहीं है। ये सभी न केवल रेणु के रचनाकाल की बल्कि हमारी समकालीन विसंगतियों, विद्रूपों और विडंबनाओं को भी रेखांकित करते हैं। इसलिए आवश्यक है कि ‘मैला आँचल’ के साथ-साथ रेणुजी के बाद के सभी उपन्यासों ‘परती परिकथा’, ‘दीर्घतपा’ (जो आगे चलकर ‘कलंकमुक्ति’ के नाम से दोबारा प्रकाशित हुआ), ‘जुलूस’, ‘पल्टू बाबू रोड’ और ‘कितने चौराहे’ पर समुचित और समकालीन संदर्भ में बातचीत की जाए।

जिस गाँव-समाज और लोकजीवन के बारे में सोचते-रचते हुए, उसकी बेहतरी के सपने देखते हुए फणीश्वरनाथ जी ने जीवन व्यतीत किया- लेखक और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता का जीवन- उनके जन्मशती वर्ष तक आते-आते उस गाँव का, अंचल का हाल क्या है? इसकी खोज खबर लेना, ठहर कर विचार करना प्रस्तुत पुस्तक का अभीष्ट है।

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