शताब्दी साहित्यकार मुल्यकं श्रंखला-1 फणीश्वरनाथ रेनु - Shatabdi Sahityakar Mulyankan Shrankhala-1 Phaneeshvaranath Renu
Description
“रेणु का नाम आते ही सिर्फ रेणु याद नहीं आते बल्कि उनके साथ बिहार की लोक संस्कृति से जुड़ी वह सारी चीजें याद आती हैं जिन्हें हमनें या तो भूला दिया है या बेच दिया है। रेणु मिथिला लोक की सबसे मजबूत दीवार हैं जिसके कंधे पर बैठकर वहां का लोक हिंदी साहित्य में झांकता है। आज जब हमने अपने लोक को विस्मृत कर दिया है, अपनी संस्कृति को बाज़ार के मुंह में ढकेल दिया है तब रेणु का होना जैसे हमारे वजूद का होना, महसूस होता है।
रेणु को पढ़ते-पढ़ाते मैला आंचल की याद आती है, संवादिया, तीसरी कसम, लाल पान की बेगम की याद आती है। रेणु को पढ़ते हुए उन किरदारों को पढ़ती हूं जो अपनी अलबेली भाषा, अनोखे खान पान और भदेस रहन सहन में रचे बसे हैं। लगता है कोई आकर कान में हंस रहा – इस्स….
संपादकीय से..”
About The Author
“डॉ. मनीष
जन्म : 10 जनवरी 1988 को बिहार के
पटना जिला के लखनपुरा गांव में। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव में ही संपन्न हुई। तत्पश्चात् उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए 2007 से दिल्ली में प्रवास।
दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती
महाविद्यालय से 2011 में हिंदी विशेष में स्नातक। 2013 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 2021 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से ‘फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्य में भूमि, जाति एवं राजनीति का अन्तःसंबंध’ विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। देश की प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में नियमित लेखन।
संप्रति : हंसराज महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय)”






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