प्रवासी हिंदी कथा साहित्य: एक मूल्यांकन- Pravasi Hindi Katha Sahitya (An Evaluation)
Description
“इस गंभीरता का एक अहम् पहलू यह भी है कि प्रवासी साहित्य को लेकर इन दिनों जो कई बहस-मुबाहिसे जारी हैं, जिसके कारण इसकी निर्मिति को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति भी पैदा होती है। हिंदी आलोचना जगत में इसके तीन रूपों पर चर्चा हो रही है। एक रूप तो वह है जो विदेशों में बसा दिए गए प्रवासी समाज द्वारा रचित साहित्य है। यह उन भारतीयों का साहित्य है जिनके पुरखे 100-150 वर्ष पहले उपनिवेशवादियों द्वारा पराये देशों में ले जाकर बसा दिए गए थे और उनकी संतानें कालांतर में ‘प्रवासी भारतीय’ के नाम से जानी जाने लगीं और उनके द्वारा रचित साहित्य ‘प्रवासी साहित्य’ कहलाया। इसका दूसरा रूप वह है जो कुछ दिनों के लिए विदेश प्रवास के दौरान स्थापित साहित्यकारों द्वारा लिखा गया साहित्य है और तीसरा वह जो भारत में रहते हुए ही विदेशी परिवेश को रेखांकित करता साहित्य है।
इस प्रकार साहित्य जगत में प्रवासी साहित्य को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। प्रवासी साहित्य के क्षेत्र में आज जो लोग भी काम कर रहे है उनमें भी इसके स्वरुप, नाम, क्षेत्र आदि को लेकर अलग जलग मत है। अधिकतर प्रवासी साहित्यकार जो इस क्षेत्र में अग्रणी है वह केवल भारत से बाहर लिखे जाने वाले हिंदी भाषा के साहित्य को ‘प्रवासी साहित्य’ में शामिल करने के कतई पक्षधर नहीं है।”
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जाहिर है कि प्रवासी साहित्य को ‘केवल जो प्रवास में रहा हो वह ही लिख सकता है’ इस सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। यह बात सही है कि विदेशों में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य ने हिंदी भाषा को वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान दिलाई है लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इस पहचान का दायरा सीमित कर दिया जाए और इसे एक खाँचे में बंद करके रख दिया जाए। प्रवासी साहित्य पर आज जो इतने बहस-मुहाबिसे, विचार-विमर्श चल रहे हैं वो इसलिए हो रहे हैं जिससे इसका क्षेत्र और व्यापक हो सके। प्रवासी लेखक स्वयं किसी दायरे में बंधना नहीं चाहते।






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