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संघर्ष तत्त्व और विशेष हिंदी नाटक

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Author Name – Dr. Gyanraj Kashinath Gaikwad ‘Rajvansh
साहित्य की एक विशेष विधा के रूप में नाटक के महत्त्व को स्वीकार किया जाता है। इसका कारण यह है कि साहित्य की अन्य विधाओं को छोड़कर केवल नाटक को ‘दृश्यकाव्य’ कहा जाता है।

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संघर्ष तत्त्व और विशेष हिंदी नाटक: Saṅgharṣa Tattva aura Viśēṣa Hindī Nāṭaka

Description

“साहित्य की एक विशेष विधा के रूप में नाटक के महत्त्व को स्वीकार किया जाता है। इसका कारण यह है कि साहित्य की अन्य विधाओं को छोड़कर केवल नाटक को ‘दृश्यकाव्य’ कहा जाता है। इसका अर्थ यह है कि साहित्य होने के कारण नाटक अपने मूल रूप में ‘काव्य’ है ही। साथ ही साथ नाटक ऐसा काव्य होता है, जो दृश्य भी होता है। इसलिए ही नाटक को ‘दृश्यकाव्य’ कहा जाता है।

साहित्य की अन्य विधाओं का आस्वादन अकेले तथा एकान्त में नेत्रों से पढ़ते हुए किया जा सकता है। लेकिन नाटक की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसका आस्वादन दो रीतियों से किया जा सकता है। एक रीति यह है कि अकेले तथा एकान्त में नेत्रों से नाटक पढ़ते हुए उसका आस्वादन करना। दूसरी रीति यह है कि जिस समय नाटक कलाकारों द्वारा अर्थात् अभिनेताओं द्वारा अनुकूल रंगमंच पर प्रस्तुत (अभिनीत) हो रहा होता है, उस समय अनेक दर्शकों के साथ नेत्रों से देखते हुए और कानों से सुनते हुए उस नाटक का आस्वादन करना।”

About The Author

नाटक कथासाहित्य का एक ऐसा रूप है, जिसे ‘दृश्यकाव्य’ कहा जाता है। ‘दृश्यकाव्य’ के रूप में नाटक की विशेषता यह होती है, कि वह नाटयगृह में अभिनेताओं अर्थात् अभिनय करने वाले कलाकारों के द्वारा रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है और उसे देखते हुए प्रेक्षकसमुदाय एक साथ प्रभावित हो जाता है। उस समय नाटक जीवन से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करता है। नाटक रंगमंच पर संघर्षशील मानव और उसके संघर्षमय जीवन की सहज अवतारणा करता है। परिणामतः संघर्ष नाटक का प्राणतत्त्व बन जाता है।

नाटक में कथानक और पात्र इन दोनों के साथ संघर्ष का संबंध होता ही है। कथानक चाहे पौराणिक हो, ऐतिहासिक हो अथवा यथार्थ के धरातल पर काल्पनिक हो, वह संघर्ष के बिना नाटक का रूप धारण नहीं कर सकता।

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