साहित्य समाज और संविधान - Sahitya samaj aur samvidhan
Description
राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, साम्प्रदायिक एकता आदि वे शब्द हैं जिनके अर्थों की एक विराट परिधि है। साधारण अर्थों में इन समस्त शब्दों से आशय व्यक्ति या व्यक्ति समूह की सकारात्मक एकजुटता से है और वह भी ऐसी जो राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद की वृद्धि करे, उसका पोषण करे न कि उसे क्षति पहुंचाये। इन्हीं सब शब्दों का मिला-जुला रूप ही राष्ट्रवाद को प्रदर्शित करता है। राष्ट्र की एकता, अखंडता, व्यक्ति की गरिमा और समस्त नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण संविधान के माध्यम से संभव है। संविधान सामाजिक समरसता और परिवर्तन को आधार बनाकर समतामूलक समाज के निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। भारतीय संविधान के निर्माण में डॉ. अंबेडकर की भूमिका अतिमहत्वपूर्ण है। संविधान लागू होने के बाद भारतीय समाज का संचालन संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ किया जा रहा है। इस व्यवस्था में व्यक्ति और समाज से जुड़े हुए सभी विषय प्रभावित हुए हैं। साहित्य भी एक ऐसा ही विषय है जो संविधान से खुद को अलग-थलग नहीं कर सकता है।
About The Author
हिन्दी साहित्य में लोकतंत्र की भूमिका को इस पुस्तक के माध्यम से समझा जा सकता है। संवैधानिक व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में व्याप्त विभिन्न प्रकार के विभेद यथाः जातीय, धार्मिक, लैंगिक इत्यादि, पर भी अंकुश लगाने का प्रयत्न किया गया है। भारत में संविधान सर्वोपरि है और यह पुस्तक साहित्य- समाज के विभिन्न आयामों में संविधान की उपस्थिति का अवलोकन करती है। साथ ही भाषा, बोली और व्यक्ति की अभिव्यक्ति के विभिन्न संवैधानिक पक्षों को उद्घाटित करती है। समाज के हासिए पर जीवन यापन करने वाले वर्गों की यथार्थ सामाजिक अवस्था और उनके संवैधानिक अधिकारों का विश्लेषण इस पुस्तक के केंद्र में है। संविधान की प्रस्तावना और उसकी उपयोगिता को यह पुस्तक संरक्षित करती है। आज के संवैधानिक दौर में साहित्य-समाज के मूल्यांकन की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी साबित होगी।






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