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Saanch Kahaun kee Aanch Saahityik Evan Bhaashaayee Vimarsh

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Author Name – Satyaketu Saankrit
गोपाल राय जी इस बात से भली-भांति सहमत थे की हिंदी फिलहाल घोर संकट की स्थिति से गुजर रही है। उन्हें यह भी मालूम था कि यह संकट बाहरी उतना नहीं है जितना भीतरी है।

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सांच कहूं की आंच साहित्यिक एवं भाषाई विमर्श - Saanch Kahaun kee Aanch Saahityik Evan Bhaashaayee Vimarsh

Description

गोपाल राय जी इस बात से भली-भांति सहमत थे की हिंदी फिलहाल घोर संकट की स्थिति से गुजर रही है। उन्हें यह भी मालूम था कि यह संकट बाहरी उतना नहीं है जितना भीतरी है। हिंदी पर चौतरफा हमले आज से नहीं हो रहे हैं। आजादी पूर्व जो हिंदी, राष्ट्रीय एकीकरण में एक महत्वपूर्ण भाषा बन कर उभरी थी, वही आज भाषाई राजनीतिकरण का शिकार बनती जा रही है। अपने एक संपादकीय में वे लिखते हैं कि ‘आज हिंदी पर चौतरफा हमले हो रहे हैं और उसका ‘राजभाषा’ और ‘राष्ट्रभाषा’ के रूप में अस्तित्व निरंतर संकटग्रस्त होता जा रहा है। आज न केवल भारत की हिंदीतर प्रमुख भाषाएं अपने-अपने क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व, स्थापित करने के लिए आंदोलन कर रही हैं, वरन हिंदी क्षेत्र की भगिनी भाषाएं भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहीं हैं।

About The Author

गोपाल राय जी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल एक अहम सवाल रहा है। उनका मानना था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर केवल उस समाज में होता है जहां लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था होती है। चूंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, अतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न यहां के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यहां यह भी स्मरणीय है कि किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं होती। हमारी स्वतंत्रता की सीमा वहीं तक है जहां तक दूसरे की स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं होता या उससे दूसरे का अहित नहीं होता। आजकल के राजनीतिक और साहित्यिक वातावरण में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने कुछ बदल से गए हैं। आजादी का अर्थ देश और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को टुकड़ों में विभाजित करके देखा जाने लगा है।

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