समीक्षा संस्कृति - Sameekshaa Sanskriti
Description
पुस्तक समीक्षा की समृद्ध परम्परा का हास होना तब आरंभ हुआ जब पुस्तक समीक्षा के नाम पर मित्रता का विकास हुआ। यहीं से पाठकों का विश्वास भी टूटना आरंभ हुआ। दरअसल पुस्तक समीक्षाओं को पढ़कर ही पाठक पुस्तकों का चुनाव करता है। अब समीक्षकों ने पुस्तकों की समीक्षा व्यक्तित्व और संबंध देखकर करना आरंभ कर दिया है। साहित्य संवेदना का विकास करती है, लेकिन आलोचना ज्ञान का विकास करता है। ज्ञान की वास्तविकता, उसकी प्रमाणिकता और यथार्थ बचा रहे इसलिए उसमें संबंध के आधार पर निर्णय लेना उचित नहीं है। समीक्षा वास्तव में किसी रचना का निर्णय है। सार है इसलिए समीक्षक को अपने आपको किसी के प्रति प्रेम और घृणा से बचाना ही उचित है।
समीक्षक के संबंध में यह आवश्यक है कि वह उसी विधा की पुस्तक का चुनाव करे जिस विद्या पर उसका अधिकार हो अगर अधिकार न हो तो कम से कम उसकी रुचि हो। विधात्मक रुचि होने से समीक्षक उस पुस्तक से भावनात्मक रूप से जुड़ता है और उसकी तकनीकी को समझता है।
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समीक्षा की कोई पाठशाला या ट्रेनिंग नहीं होती लेकिन इसके टूल्स को समझना आवश्यक है। कई बार सामान्य पाठक भी बेहतर समीक्षा कर सकता है। समीक्षा के लिए मूलतः व्यक्ति के अन्दर पढ़ने की गम्भीरता होनी चाहिए। बिना पढ़े न तो आलोचना हो सकती है और न ही समीक्षा। हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक गोपाल राय ने इसीलिए ‘अध्यापकीय आलोचना’ नाम से एक स्तम्भशुरू किया था जिसका स्वागत और विरोध दोनों हुआ। कुछ का मानना था कि आलोचक होने के लिए अध्यापक होना आवश्यक नहीं है जबकि प्रोफ़ेसर राय का कहना कुछ और ही था। उनका कहना था कि प्राध्यापक बेहतर आलोचक हो सकता है क्योंकि वह अध्ययन करता है। दरअसल आलोचना का संबंध शोध से भी है। जिसके अन्दर शोध की प्रवृत्ति होगी वही समीक्षा या आलोचना कर सकता है।






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