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शब्दशक्ति, रीति और ध्वनि

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Author Name – Shravan Kumar Gupt
इस पुस्तक में संस्कृत और हिन्दी रीतिकालीन आचार्यों ने शब्दशक्ति, रीति और ध्वनि तीनों सिद्धांतों पर जो विचार प्रस्तुत किया है उसका संक्षिप्त लेखा-जोखा है।

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शब्दशक्ति, रीति और ध्वनि- Shabdshakti, Riti aur Dhvani

Description

इस पुस्तक में संस्कृत और हिन्दी रीतिकालीन आचार्यों ने शब्दशक्ति, रीति और ध्वनि तीनों सिद्धांतों पर जो विचार प्रस्तुत किया है उसका संक्षिप्त लेखा-जोखा है। संस्कृत काव्यशास्त्र में शब्दशक्ति पर विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है। रीति और ध्वनि सम्बन्धी विवेचन अपेक्षाकृत कम हुआ है। रीति सिद्धांत पर सर्वाधिक विस्तृत चर्चा आचार्य वामन ने अपने ग्रंथ ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्ति’ में की है। तथापि ध्वनि पर सर्वप्रथम विस्तृत चर्चा-परिचर्चा आचार्य आनंदवर्धन ने अपने ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ में की है। शब्दशक्तियों पर विचार-विमर्श भारतीय वांग्मय में सर्वथा प्राचीन रहा है। वेदांगों में व्याकरण और निरुक्त के अन्तर्गत शब्दशक्तियों पर अध्ययन-अध्यापन होता रहा है। संस्कृत काव्यशास्त्र से पूर्व शब्दशक्तियों पर विचार करने वाले तीन तरह के मत प्राप्त होते हैं-व्याकरण मत, न्याय मत और मीमांसा मत। संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रायः सभी विद्वानों ने शब्दशक्तियों की विवेचना की है। काव्यप्रकाशकार आचार्य मम्मट ने अंतिम रूप से शब्दशक्तियों पर अपने विचारों को प्रस्तुत किया । रीतिकाल के हिंदी आचार्यों ने भी शब्दशक्तियों पर विचार किया है परन्तु उनके द्वारा प्रस्तुत विचार अधिकांशतः आचार्य मम्मट के अनुगामी हैं। रीतिकालीन हिंदी आचार्यों ने आचार्य मम्मट का अनुकरण करते हुए अपने शब्दशक्ति निरुपण को पूर्णता प्रदान की है। रीतिकालीन आचायर्यों के शब्दशक्ति चिन्तन में मौलिकता न के बराबर प्राप्त होती है। इस मौलिकता की कमी का कारण रीतिकालीन आचार्यों पर संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों के ज्ञान का आतंक था । संस्कृत काव्यशास्त्र में जो भी विवेचन-विश्लेषण आचार्यों ने किया है उनमें उन्होंने कुछ भी अतिरिक्त करने की सम्भावना छोड़ी नहीं थी। रीतिकालीन आचार्यों का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि शब्दशक्ति जैसे गूढ़ प्रकरण को सरल भाषा और लहजे में हिंदी में लाने का स्तुत्य प्रयास किया।

About The Author

“वशिष्ठ की त्य-साधना

साहित्य में रीति शब्द का प्रयोग वैदिक काल से प्राप्त होता है। वेदों में रीति शब्द का प्रयोग मार्ग या गमन के रूप में हुआ है। संस्कृत काव्यशास्र में आचार्य वामन से पूर्व ‘रीति’ शब्द का प्रयोग साधारणतः मार्ग अथवा पथ के रूप में हुआ है। आचार्य वामन ने सर्वप्रथम संस्कृत काव्यशास्त्र में रीति को काव्य की आत्मा के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्ति’ में रीति की विस्तृत व्याख्या की और रीति को काव्य का आधार माना। काव्यशास्त्रीय परिदृश्य और इतिहास में रीति का विवेचन आचार्य वामन तक ही सीमित रह गया। रीति सम्प्रदाय का प्रथम और अंतिम विद्वान आचार्य वामन को ही माना जाता है। वामन के उपरांत संस्कृत काव्यशास्त्र में रीति पर अधिक चर्चा नहीं हुई। वामन के बाद जो भी आचार्य संस्कृत काव्यशास्त्र में हुए उन्होंने रीति का वर्णन मार्ग के रूप में ही किया है। रीतियों के विषय में चर्चा होनी तब बंद हो गयी जब आचार्य मम्मट ने रीतियों की चर्चा वृत्यानुप्रास के अंतर्गत कर दी। मम्मट के पश्चात् प्रायः सभी विद्वानों ने उनका अनुकरण करते हुए रीतियों को अनुप्रास के अंतर्गत ही स्थान दिया है। रीतिकाल में रीति शब्द के दो अर्थ हमारे समक्ष प्रस्तुत होते हैं। पहला रीति को अनुप्रास का अंग मानना और दूसरा रीति से तात्पर्य अंतर्वस्तु के आधार पर एक प्रकार की पाए जाने वाली रचनाएं। कुछ लक्षण ग्रंथकारों ने रीति के दोनों अर्थों को अपने लक्षण ग्रन्थों में ग्रहण किया है। आचार्य वामन के यहाँ रीति की जो विस्तृत व्याख्या हुई है उसपर रीतिकालीन आचार्यों की दृष्टि नहीं गई। यह दुर्भाग्य ही है कि हिंदी के रीतिकालीन आचार्य मम्मट के द्वारा किये गए विवेचन को अंतिम रूप से मान लेते हैं। यही कारण है की रीति को लेकर कोई नयी अवधारणा रीतिकालीन आचार्य प्रस्तुत नहीं कर पाते।”

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