द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली खंड 1 - Dwarika Prasad Maheshwari Rachanawali Vol 1
Description
“स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता और बाल साहित्य में अपनी विशिष्ट रचना शैली के लिए द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का परिचय नया नहीं है। मानवीय चेतना के उदात्त काव्य-सूजन ‘दीपक’ के माध्यम से साहित्य में अपनी अभिव्यक्ति की लौ जगाने वाले माहेश्वरी जी की रचना-धारा काव्य और बालगीत दोनों विधाओं में समान रूप से सक्रिय रही है। लंबे अरसे तक शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण सर्जनात्मक शैक्षिक चिंतन और नव साक्षरोपयोगी पाठ्य साहित्य के क्षेत्र में भी उनकी कृतियां अपनी उज्ज्वल छाप छोड़ती है।
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जिन दिनों रचनारत थे और इलाहाबाद में थे, उस साहित्यिक पर्यावरण में निराला, पंत, महादेवी, नरेश मेहता, जगदीश गुप्त, बालकृष्ण राव जैसे अनेक साहित्यकार सक्रिय थे।
छायावादोत्तर युग के कवि होने के नाते उनमें निराला, बच्चन, अंचल व शिवमंगल सिंह – सरीखी कवि चेतना विद्यमान रही है तथा उनके बिम्ब, प्रतीक और रूपकों के सुसंयोजन से उनके उदात्त काव्य विधान का परिचय मिलता है
वे शिक्षा जगत से जुड़े होने के कारण शैक्षिक साहित्य की ओर उन्मुख थे लेकिन मूलत वे कवि थे। इसलिए अपनी शुरुआत उन्होंने स्फुट कविताओं से की और अपने चार-पांच दशकों के रचना काल में ‘दीपक’ के साथ ‘ज्योति किरण’, ‘फूल और शूल’, ‘शूल की सेज’, ‘शंख और बांसुरी’ कविता संग्रह और ‘क्रौंच वध’ तथा ‘सत्य की जीत’ जैसे खंडकाव्य हिंदी साहित्य को दिए।”
About The Author
“माहेश्वरी जी की कविताओं में एक गहरी आत्मोन्मुखता है। प्रकृति और मानव को उन्होंने अत्यन्त तादात्म्य भाव से ग्रहण किया है। कविता कवि के मन से फूटती है। कवि के भीतर की अनुभूति ही कहीं कविता की शक्ल ग्रहण करती है। वास्तव में कवि अपनी कविता के माध्यम से स्वगत निवेदन करता है। वह कविताओं में खुलता है। अपने आत्मकथ्य को कवि कितनी ही तरह से, कितनी ही बार कहता है। तभी वह भावबद्ध होकर कहता है: मेरी कविता का हर बोल तुम्हारा है। माहेश्वरी जी की ऐसी अनेक कविताएँ हैं, जो उनके अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति होते हुए भी साधारणीकरण का भाव जगाती है।
कविता के निरंतर बदलते हुए कथ्य एवं शिल्प के बावजूद बीते दशकों में प्रकाशित उनके काव्य संसार में समकालीन जीवन की विसंगतियाँ, यथार्थ के रचनात्मक सहकार के साथ उजागर हुई है। उनकी कविताओं में निहित प्रेम, त्याग, करुणा और मानवीय सरोकारों की पक्षधरता पाठक को बराबर की साझेदारी और आत्मीयता की प्रतीति कराती है। बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान विपुल है।
वे गाँधी चिंतन और मानवतावादी चिंतन की ओर उन्मुख यशस्वी रचनाकार है। मानवीय सौहार्द्र के निरंतर क्षय होते काल-खंड में माहेश्वरी जी की मानवतावादी रचनाएँ सदैव प्रासंगिक रहेंगी। रचनावली के प्रथम खंड में उनके कविता संग्रह और खंडकाव्य समाहित हैं। इनसे छायावादोत्तर आधुनिक कविता के स्वत्व की सुगंध आती है।
चार खंडों में प्रकाशित यह रचनावली रचनाकार के समग्र रचना-संसार की नूतन प्रस्तुति है।”






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